पदार्थान्वयभाषाः - [१] देव कहते हैं कि हे (अग्ने) = प्रकाशमय प्रभो! आप से हम हव्य पदार्थों को प्राप्त करेंगे तो हम यह प्रतिज्ञा करते हैं कि (तव) = आपके ही (प्रयाजा:) = प्रयाज होंगे। प्रथम हम आपके निमित्त ही आहुतियाँ देंगे। बचे हुए को ही जीवन के लिये व्ययित करेंगे। और हव्य द्रव्य के बच जाने पर अनुयाजाः च केवले अनुयाज भी मुख्य रूप से आपके ही होंगे। बचे हुए धन को भी हम लोकहित में ही विनियुक्त करते हुए आपको ही दे डालेंगे। (हविषः) = उस हविर्द्रव्य के (ऊर्जस्वन्तः भागाः) = शक्तिशाली उत्कृष्ट भाग (सन्तु) = आपके ही होंगे। हम यज्ञशेष का ही जीवनयात्रा के लिये विनियोग करेंगे। [२] हे (अग्ने) = प्रभो ! (अयं सर्वः यज्ञः तव अस्तु) = यह सारा जीवन ही यज्ञ होकर आपका हो जाए। हम इस पुरुष को परम पुरुष आपके लिये अर्पित कर दें । (चतस्त्र: प्रदिशः) = ये चारों विशाल दिशाएँ (तुभ्यं नमन्ताम्) = आपके लिए नमस्कार करें। सब कोई आपके प्रति नतमस्तक हो और इस प्रकार धन को प्राप्त करके भी धन का दुरुपयोग करनेवाला न हो। यही जीवन का सौन्दर्य है कि हम श्री सम्पन्न हैं पर उस श्री के दास नहीं । यह प्रभु नमन से ही सम्भव है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - जीवन को यज्ञमय बनाकर प्रभु के प्रति अर्पण करनेवाले बनें। सूक्त का प्रारम्भ इन शब्दों से होता है कि योगमाया से आवृत वे प्रभु सब किसी को दिखते नहीं, [१] प्राणापान की साधना मनुष्य को प्रभु-दर्शन के योग्य बनाती है, [२] संयमी पुरुष ही उसे देख पाता है, [३] ज्ञानियों के लिये प्रभु की महिमा कण-कण में दृष्टिगोचर होती है, [४] वे प्रभु ही हमें जीवन के अन्धकार में प्रकाश को प्राप्त कराते हैं, [५] सामान्यतः मनुष्य भौतिक वस्तुओं की ही आराधना करता है, [६] हमारा कर्त्तव्य है कि धन को प्राप्त करके भी प्रभु को न भूलें, [७] धन का यज्ञों में विनियोग करें यज्ञशेष का ही सेवन करें, [८] जीवन को यज्ञमय बनाकर प्रभु के प्रति अर्पण कर दें, [९] इन यज्ञात्मक जीवनवाले देवों से प्रभु कहते हैं-