वांछित मन्त्र चुनें
439 बार पढ़ा गया

अवा॒ नु कं॒ ज्याया॑न्य॒ज्ञव॑नसो म॒हीं त॒ ओमा॑त्रां कृ॒ष्टयो॑ विदुः । असो॒ नु क॑म॒जरो॒ वर्धा॑श्च॒ विश्वेदे॒ता सव॑ना तूतु॒मा कृ॑षे ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

avā nu kaṁ jyāyān yajñavanaso mahīṁ ta omātrāṁ kṛṣṭayo viduḥ | aso nu kam ajaro vardhāś ca viśved etā savanā tūtumā kṛṣe ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अव॑ । नु । क॒म् । ज्याया॑न् । य॒ज्ञऽव॑नसः । म॒हीम् । ते॒ । ओमा॑त्राम् । कृ॒ष्टयः॑ । वि॒दुः॒ । असः॑ । नु । क॒म् । अ॒जरः॑ । वर्धाः॑ । च॒ । विश्वा॑ । इत् । ए॒ता । सव॑ना । तू॒तु॒मा । कृ॒षे॒ ॥ १०.५०.५

439 बार पढ़ा गया
ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:50» मन्त्र:5 | अष्टक:8» अध्याय:1» वर्ग:9» मन्त्र:5 | मण्डल:10» अनुवाक:4» मन्त्र:5


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (ज्यायान्) हे इन्द्र ऐश्वर्यवन् परमात्मन् ! तू महान् है (यज्ञवनसः-नु कम्-अव) अध्यात्मयज्ञ को जो सेवन करते हैं, उनकी शीघ्र रक्षा कर (ते महीम्-ओमात्रां कृष्टयः-विदुः) तेरी महती रक्षा को मनुष्य जानते हैं (अजरः-नु कम्-असः-च वर्धाः) तू अजर-जरारहित है, शीघ्र हमें बढ़ा (विश्वा-एता सवना-इत्-तूतुमा-कृषे) सारी इन निष्पादन करने योग्य स्तुति-प्रार्थना-उपासनाओं को शीघ्र स्वीकार करता है, ये भी जानते हैं ॥५॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा महान् है, उसकी रक्षणशक्ति भी महती है। वह अध्यात्मयाजी जनों की पूरी रक्षा करता है। उसकी स्तुति, प्रार्थना, उपासनाओं को अवश्य शीघ्र स्वीकार करता है ॥५॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सर्वरक्षक प्रभु

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे प्रभो! (नु) = अब (कम्) = सुखस्वरूप आप (ज्यायान्) = सर्वमहान् हैं और (यज्ञवनसः) = यज्ञों का सेवन करनेवालों को (अवा) = रक्षित करते हैं। यज्ञशील पुरुषों का रक्षण प्रभु ही करते हैं, वस्तुतः प्रभु से रक्षित होकर ही वे अपने यज्ञों का रक्षण कर पाते हैं । [२] (कृष्टयः) = कृष्टि करनेवाले श्रमशील व्यक्ति ही (ते) = आपकी (महीम्) = महनीय-आदरणीय व शक्ति सम्पन्न (ओमात्राम्) = रक्षा को (विदुः) = प्राप्त करते हैं। श्रमशील पुरुषों का ही आप रक्षण करते हैं। [३] (नु) = अब (कम्) = आनन्दस्वरूप आप (अजरः अस:) = कभी जीर्ण न होनेवाले हैं (च) = और (वर्धा:) = [वर्धस्व] वृद्धि को प्राप्त हो, सदा वृद्ध हो । प्रभु कभी जीर्ण नहीं होते हैं और सदा बढ़े हुए रहते हैं । [४] हे प्रभो ! आप ही (इत्) = सचमुच (विश्वा एता सवना) = इन सब यज्ञों को (तूतुमा) = [ तूर्णानि ] शीघ्रता से होनेवाला कृषे करते हैं । आपकी कृपा से यज्ञ शीघ्रता से पूर्ण होते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु यज्ञों व यज्ञशील पुरुषों का रक्षण करते हैं ।

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (ज्यायान्) हे इन्द्र-ऐश्वर्यवन् परमात्मन् ! त्वं महान्-असि (यज्ञवनसः-नु कम्-अव) ये-अध्यात्मयज्ञं वनन्ति सम्भजन्ति-अध्यात्मयज्ञस्यानुष्ठातारस्तान् शीघ्रं रक्ष (ते महीम्-ओमात्रां कृष्टयः-विदुः) तव महतीं रक्षाम् “अव रक्षणे” [भ्वादिः] ‘मात्रन् प्रत्ययो बाहुलकादौणादिकः, ऊठ् च बाहुलादेव’ मनुष्या जानन्ति (अजरः नु कम्-असः-च वर्धाः) त्वं खल्वजरो जरारहितो भवसि शीघ्रं वर्धय (विश्वा-एता सवना-इत्-तूतुमा-कृषे) सर्वाणि-एतानि सवनानि निष्पाद्यानि स्तुतिप्रार्थनोपासनानि शीघ्रं स्वीकरोषि, इत्यपि जानन्ति ॥५॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra, you are great, pray protect and promote the lovers and performers of the divine yajna of faith and creativity. People know the grandeur and greatness of your power of protection. Unaging and imperishable you are, pray promote life and all. Indeed, ultimately, it is you who effect all these acts of creation and progress with strength and speed.