पदार्थान्वयभाषाः - [१] (स उ चित् नु) = वे प्रभु ही निश्चय से (सख्या) = सखित्व के कारण (नर्यः) = नरों का हित करनेवाले हैं। नर वह है जो कि उन्नतिपथ पर अपने को ले चलने के लिये यत्न करता है, प्रभु इन नरों का सदा हित करते हैं। प्रभु भी इनकी उन्नति में सहायक होते हैं। (इन:) = प्रभु ही तो स्वामी हैं। वे प्रभु ही (स्तुतः) = सदा स्तुति किये जाते हैं और (चर्कृत्यः) = [कर्तव्यैः पुनः पुनः परिचरणीयः सा० ] वे कर्त्तव्यपालन के द्वारा सदा पूजा के योग्य हैं। प्रभु का पूजन यही है कि हम अपने कर्त्तव्य कर्मों में प्रमाद न करें। [२] वे प्रभु (मा वते नरे) = लक्ष्मीवाले मनुष्य के लिये (इन्द्रः) = परमैश्वर्यशाली हैं । अर्थात् वस्तुतः लक्ष्मी के देनेवाले प्रभु ही हैं। लक्ष्मी का विजय करनेवाले प्रभु ही हैं। जैसे बुद्धिमानों की बुद्धि प्रभु हैं, बलवानों के बल व तेजस्वियों के तेज प्रभु हैं उसी प्रकार लक्ष्मीवानों की लक्ष्मी भी प्रभु ही हैं। [३] हे शूर- सब विघ्नों व शत्रुओं को शीर्ण करनेवाले सत्पते सज्जनों के रक्षक प्रभो! आप (विश्वासु धूर्षु) = सब कार्यभारों में, (वाजकृत्येषु) = शक्तिशाली कर्मों में (वृत्रे) = ज्ञान को आवृत करनेवाले सर्वमहान् शत्रु काम के आक्रमण में (वा) = तथा (अप्सु) = रेतः कणों के रक्षण के प्रसंग में (अभिप्रमन्दसे) = [अभिष्टयसे] स्तुति किये जाते हो। आपका स्तवन करते हुए हम आपकी शक्ति से शक्ति-सम्पन्न होकर उसे उस कार्यभार को उठा पाते हैं, शक्ति की अपेक्षा करनेवाले कार्यों में घबराते नहीं, वासना के आक्रमण को विफल कर पाते हैं और रेतः कणों के रक्षण में समर्थ होते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु के हम मित्र बनें, प्रभु हमारा कल्याण करेंगे। वे प्रभु कर्मों से स्तुत होते वे ही हमारे लिये लक्ष्मी का विजय करते हैं। उनका स्मरण ही हमें सब कार्यों की पूर्ति में, वासना के विध्वंस में तथा रेतः कणों के रक्षण में समर्थ करता है ।