तुर्वश- यदु का सहस्वाला जीवन
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (अहम्) - मैं (सप्त-हा) = सात असुरों का संहार करनेवाला हूँ। [क] इन्द्रियाँ सामान्यतः दस हैं। इनमें त्वचा को हाथों में समाविष्ट करके, क्योंकि हाथों से ही प्रायः स्पर्श किया जाता है, वाणी और जिह्वा को एक मानकर तथा मल-शोधक (पायु) = उपस्थ को एक में मिला देने से ये सात रह जाती हैं। इनको ठीक मार्ग पर ले चलनेवाले तो देव कहलाते हैं और इनको विचरीत मार्ग पर ले जानेवाले असुर होते हैं। इन सात असुरों को प्रभु उचित दण्ड के द्वारा आहत करते हैं । [ख] 'सप्त मर्यादाः कवयस्ततक्षुः ' इस मन्त्र में सात मर्यादाओं का उल्लेख है, इन मर्यादाओं का उल्लंघन करनेवाले सात असुर हैं। इनका पालन करनेवाले सप्तर्षि हैं। [ग] सात मर्यादाओं का पालन करनेवाले सात उत्तम लोकों को प्राप्त करनेवाले होते हैं, और इनके उल्लंघन करनेवाले सात असुर्य लोकों में जन्म लेते हैं 'असुर्या नाम ते लोकाः अन्धेन तमसावृताः'। प्रभु इन सात आसुर वृत्तिवाले लोगों को नष्ट करते हैं। (नहुष: नहुष्टरः) [ णह बन्धने] = प्रभु इन्हें दृढ़ता से बन्धन में डालनेवाले हैं। इनको इन बन्धनों में रखकर वे इनकी अशुभवृत्तियों को दूर करने का प्रयत्न करते हैं । [२] जो व्यक्ति (तुर्वशम्) = त्वरा से [शीघ्रता से ] इन इन्द्रियों को वशीभूत करनेवाला होता है और (यदुम्) = यत्नशील होता है, कभी अकर्मण्य नहीं होता उसे मैं (शवसा) = बल के दृष्टिकोण से (प्राश्रावयम्) = प्रकृष्ट यशवाला करता हूँ (अहम्) = मैं (कन्यम्) = असुरों से भिन्न इस दैवी वृत्तिवाले पुरुष को (सहसा) = सहनशक्ति के रूप में प्रकट होनेवाले बल से (सहः) = सहस् का पुञ्ज ही (निकरम्) = निश्चय से बना देता हूँ और (व्राधतः) = वृद्धि को प्राप्त होनेवाले [व्राध= broad] फैलते जानेवाले, (नव नवतिं च) = निन्यानवे, अर्थात् अनेक आसुरभावों को (वक्षयम्) [अन्तशयम् सा०] = नष्ट कर देता हूँ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - आसुर वृत्तिवालों को प्रभु बन्धन में डालते हैं। दैवी वृत्तिवाले 'जितेन्द्रिय-यत्नशील' पुरुषों को वे सहस् का, बल का पुञ्ज बनाते हैं। इन पर आक्रमण करनेवाली अशुभ वृत्तियों को वे विनष्ट करते हैं ।