[प्रभु ही सबका धारण कर रहे हैं] संसार वहन
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (अहम्) = मैं ही (ओजसा) = ओजस्विता के द्वारा (वहमानः) = सम्पूर्ण संसार का धारण करता हुआ (सूर्यस्य) = सूर्य की (आशुभिः) = शीघ्रता से सर्वत्र व्याप्त होनेवाली (एतशेभिः) = रंग-विरंगे अश्व रूप किरणों से (प्र) = प्रकर्षेण (परियामि) = ब्रह्माण्ड में सर्वत्र गति करता हूँ। सूर्य की किरणें सात रंगों की हैं, ये ही सूर्य के सात अश्व कहलाते हैं। रंग-बिरंगे रंगों में शयन करने से ये एतश कहलाते हैं [एत-श] इनमें सब प्रकार के प्राणों का निवास है। इन प्राणशक्तियों के द्वारा सूर्य किरणें सब रोगों का संहार करती हैं। सूर्यकिरणों के द्वारा यह कार्य प्रभु ही करते हैं, प्रभु का तेज ही सूर्य को तेजोमय करता है। सूर्य को ही नहीं, प्रत्येक तेजसी पदार्थ को प्रभु ही तेजस्वी बना रहे हैं । प्रभु के तेज से प्रत्येक देव देवत्व को प्राप्त करता है। [२] मानव जीवन में भी देवत्व को प्रभु ही उत्पन्न करते हैं, प्रभु कहते हैं कि मैं ही (कृत्व्यम्) = [कृती छेदने] छेदन के योग्य (दासम्) = औरों के ध्वंस की वृत्तिवाले पुरुष को (हथैः) = हनन साधनों से (ऋधक् कृषे) = पृथक् कर देता हूँ। यह मैं करता तभी हूँ (यत्) = जब कि (मा) = मुझे (मनुषः) = विचारशील पुरुष का (सावः) = यज्ञ (निर्णिजे) = इस शोधन के लिये आह कहता है । अर्थात् जब हम यज्ञ की वृत्तिवाले बनते हैं और यदि उस समय एक दास वृत्ति का पुरुष हमारा ध्वंस करता है, तो प्रभु उसके हनन के द्वारा सामाजिक वातावरण को शुद्ध कर देते हैं । इस प्रकार यज्ञशील पुरुषों के लिये प्रभु सहायक होते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु सूर्यादि देवों की दीप्ति के स्रोत हैं और दास के हनन के द्वारा यज्ञशील पुरुषों के सहायक होते हैं ।