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अ॒हं दां॑ गृण॒ते पूर्व्यं॒ वस्व॒हं ब्रह्म॑ कृणवं॒ मह्यं॒ वर्ध॑नम् । अ॒हं भु॑वं॒ यज॑मानस्य चोदि॒ताय॑ज्वनः साक्षि॒ विश्व॑स्मि॒न्भरे॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ahaṁ dāṁ gṛṇate pūrvyaṁ vasv aham brahma kṛṇavam mahyaṁ vardhanam | aham bhuvaṁ yajamānasya coditāyajvanaḥ sākṣi viśvasmin bhare ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अ॒हम् । दा॒म् । गृ॒ण॒ते । पूर्व्य॑म् । वसु॑ । अ॒हम् । ब्रह्म॑ । कृ॒ण॒व॒म् । मह्य॑म् । वर्ध॑नम् । अ॒हम् । भु॒व॒म् । यज॑मानस्य । चो॒दि॒ता । अय॑ज्वनः । सा॒क्षि॒ । विश्व॑स्मिन् । भरे॑ ॥ १०.४९.१

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ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:49» मन्त्र:1 | अष्टक:8» अध्याय:1» वर्ग:7» मन्त्र:1 | मण्डल:10» अनुवाक:4» मन्त्र:1


ब्रह्ममुनि

इस सूक्त में ‘इन्द्र’ शब्द से परमात्मा गृहीत है। उसकी उपासना से व्यसन कामवासनादि दोष दूर हो जाते हैं और उपासक मोक्ष को प्राप्त करते हैं इत्यादि विषय वर्णित हैं ।

पदार्थान्वयभाषाः - (अहं गृणते पूर्व्यं वसु दाम्) मैं परमात्मा स्तुतिकर्त्ता के लिए शाश्वतिक मोक्ष-बसानेवाले धन को देता हूँ (अहं ब्रह्म मह्यं वर्धनं कृणवम्) मैं वेदज्ञान जो मेरे लिए वृद्धि का कारण मेरे गुण जनानेवाला है, उसे मैं प्रकाशित करता हूँ (अहं यजमानस्य चोदिता) मैं परमात्मा  अध्यात्मयाजी यजमान का प्रेरक हूँ (अयज्वनः-भरे विश्वस्मिन् साक्षि) अध्यात्मयज्ञ न करनेवाले नास्तिक जनों को पोषणीय संसार में अभिभूत करता हूँ-दण्डित करता हूँ ॥१॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा की स्तुति  करनेवाला शाश्वतिक सुखमय मोक्ष को प्राप्त होता है। परमात्मा के गुणों का वर्णन करनेवाले वेद का परमात्मा प्रकाश करता है, तदनुसार अध्यात्मयाजी को वह प्रेरणा देता है, नास्तिक जनों को संसार में दण्ड देता है ॥१॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

उत्कृष्ट वसु की प्राप्ति

पदार्थान्वयभाषाः - [१] प्रभु कहते हैं कि (अहम्) = मैं ही (गृणते) = स्तवन करनेवाले के लिए (पूर्व्यं वसु) = उत्कृष्ट धन को अथवा पालन व पूरण करनेवाले धन को (दाम्) = देता हूँ । प्रभु भक्त सदा क्रियाशील होता है । उसकी क्रिया केवल अपने हित के लिये न होकर लोकहित के दृष्टिकोण से होती है। इसे आवश्यक साधनों की प्रभु कमी नहीं होने देते। [२] मैं इस स्तोता के लिये ब्रह्म उस ज्ञान को भी (कृणवम्) = करता हूँ, जो ज्ञान की (मह्यम्) = मेरे लिये ही (वर्धनम्) = वर्धन का कारण होता है । ज्ञान को प्राप्त करके मनुष्य प्रभु-भक्त बनता है और प्रभु का स्तवन करता हुआ प्रभु की महिमा को सर्वत्र फैलाता है। [३] (अहम्) = मैं ही (यजमानस्य) = यज्ञशील पुरुषों का (चोदिता भुवम्) = प्रेरक होता हूँ । इन्हें उत्तम कर्मों की प्रेरणा मेरे से ही प्राप्त होती है। इसी यज्ञशीलता की वृद्धि के लिये (विश्वस्मिन् भरे) = सम्पूर्ण संग्रामों में (अयज्वनः) = अयज्ञशील पुरुषों को (साक्षि) = मैं अभिभूत करता हूँ । अयज्ञशील पुरुष के उभयलोक विनष्ट होते हैं। यज्ञ से ही मनुष्य फलता-फूलता है । इस यज्ञ से ही सच्चा प्रभु - पूजन होता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु भक्तों को उत्कृष्ट वसु प्राप्त कराते हैं व यज्ञ की प्रेरणा देते हैं ।

ब्रह्ममुनि

अस्मिन् सूक्ते ‘इन्द्र’शब्देन परमात्मा गृह्यते। तस्योपासनेनो-पासकानां कामवासनादयो दोषा दूरीभवन्ति ते मोक्षं च प्राप्नुवन्तीत्येवमादयो विषया वर्ण्यन्ते ।

पदार्थान्वयभाषाः - (अहं गृणते पूर्व्यं वसु दाम्) अहं परमात्मा स्तुतिकर्त्रे शाश्वतिकं मोक्षं वसु-वासधनं ददामि (अहं ब्रह्म मह्यं वर्धनं कृणवम्) अहं खलु वेदज्ञानं यद् हि मह्यं मदर्थं वर्धनकारणं गुणप्रज्ञापनं मदीयं यद् गुणजातं वर्णयति तत् करोमि (अहं यजमानस्य चोदिता) अहमेव परमात्मा यजमानस्य-अध्यात्मयाजिनः प्रेरयिताऽस्मि (अयज्वनः-भरे विश्वस्मिन् साक्षि) अध्यात्मयजनं न कुर्वतो नास्तिकान् भरणीये संसारेऽभिभवामि ॥१॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - I give to the celebrant of divinity eternal peace and freedom of the soul, the highest value of life across the world of existence. I create the eternal song of existence for self celebration in joyous exaltation. I am the giver of inspiration to the yajnic performer and partner in cosmic evolution, and I subdue the negationist and uncreative soul in the entire struggle of life for evolution.