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अ॒हं गु॒ङ्गुभ्यो॑ अतिथि॒ग्वमिष्क॑र॒मिषं॒ न वृ॑त्र॒तुरं॑ वि॒क्षु धा॑रयम् । यत्प॑र्णय॒घ्न उ॒त वा॑ करञ्ज॒हे प्राहं म॒हे वृ॑त्र॒हत्ये॒ अशु॑श्रवि ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ahaṁ guṅgubhyo atithigvam iṣkaram iṣaṁ na vṛtraturaṁ vikṣu dhārayam | yat parṇayaghna uta vā karañjahe prāham mahe vṛtrahatye aśuśravi ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अ॒हम् । गु॒ङ्गुऽभ्यः॑ । अ॒ति॒थि॒ऽग्वम् । इष्क॑रम् । इष॑म् । न । वृ॒त्र॒ऽतुर॑म् । वि॒क्षु । धा॒र॒य॒म् । यत् । प॒र्ण॒य॒ऽघ्ने । उ॒त । वा॒ । क॒र॒ञ्ज॒ऽहे । प्र । अ॒हम् । म॒हे । वृ॒त्र॒ऽहत्ये॑ । अशु॑श्रवि ॥ १०.४८.८

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ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:48» मन्त्र:8 | अष्टक:8» अध्याय:1» वर्ग:6» मन्त्र:3 | मण्डल:10» अनुवाक:4» मन्त्र:8


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अहम्) मैं परमात्मा (विक्षु गुङ्गुभ्यः) मनुष्यप्रजाओं में मेरे लिए जो अव्यक्त शब्द गाते हैं-मानसिक जप करते हैं, उनके हित के लिए (अतिथिग्वम्) अतिथि द्वारा-ज्ञानोपासक द्वारा प्रापणीय (इष्करम्-इषं न धारयम्) इष्ट करनेवाले अन्नादि की भाँति मोक्षसुख (वृत्रतुरम्) पापज्ञाननाशक को धारण करता हूँ (यत् पर्णयघ्ने-उत वा करञ्जहे) यतः मुझ पालनेवाले परमात्मा को प्राप्त होनेवाले आस्तिक उपासक जन को जो हनन करता है, उसके लिए तथा मेरी शरण को जो त्यागता है, उस नास्तिक के लिए (महे वृत्रहत्ये-अहं प्र-अशुश्रवि) उसके वध के निमित्त-महान् पापनाशन कार्य के निमित्त, मैं प्रकृष्टरूप से प्रसिद्ध हूँ ॥८॥
भावार्थभाषाः - जो मनुष्य परमात्मा के लिए उपांशु-अव्यक्त या मानसिक जप करता है, वह उनके अज्ञान को नष्ट करता है तथा जो ज्ञानी जन परमात्मा को प्राप्त करना चाहते हैं, वह उन्हें मोक्ष प्रदान करता है। परमात्मा की शरण लेनेवाले के प्रति जो पापचिन्तन करता है, उसको वह दण्ड देता है ॥८॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

गुंगु द्वारा पर्णय करञ्ज व वृत्र का नाश

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (अहम्) = मैं (गुङ्गभ्यः) = [ गम् धातु से गंगा की तरह यह गुंगु शब्द बना है] निरन्तर गतिशील पुरुषों के लिये (अतिथिग्वम्) = [अतिथि गच्छति] उस महान् अतिथि प्रभु की ओर चलनेवाले, अर्थात् प्रभु के सतत उपासक, (इष्करम्) = प्रेरणा को देनेवाले (वृत्रतुरम्) = कामवासना को नष्ट करनेवाले पुरुष को (धारयम्) = धारण करता हूँ, प्राप्त करता हूँ । उसी प्रकार प्राप्त करता हूँ (न) = जैसे (विक्षु) = प्रजाओं में (इषम्) = अन्न को । अन्न प्रजाओं के पोषण के लिये होता है, इसी प्रकार इस व्यक्ति की प्रेरणा उन क्रियाशील पुरुषों को अध्यात्म भोजन प्राप्त कराती है। इससे प्रेरणा को प्राप्त करके वे भी प्रभु की ओर चलनेवाले व वासना को नष्ट करके ऊपर उठनेवाले होते हैं । [२] 'पर्णय' एक आसुरी वृत्ति है जो 'पर्णं याति' पंख को प्राप्त करती है, सदा उड़ती है और 'इतना तो है, इतना और हो जाएगा, इस प्रकार सोचनेवाली होती है, यही 'लोभ' है। 'क- रञ्ज' [कं शिरः रञ्जयति reddens] ‘क्रोध' है, यह शिरोभाग को, मुख को लाल-लाल कर देता है। 'वृत्र' = ज्ञान पर आवरण को डालता हुआ 'काम' है । (यत्) = जब गुंगु पुरुष अतिथिग्व की प्रेरणा को सुनकर इन पर्णय आदि का नाश करते हैं तब (पर्णयघ्ने) = लोभ के विनाशक संग्राम में (उत वा) = और (करञ्जहे) = क्रोध के हनन में और (महे वृत्रहत्ये) = इस महान् काम-विनाश रूप कार्य में (अहम्) = मैं (प्र अशुश्रवि) = खूब ही सुना जाता हूँ। प्रभु का स्मरण व नामोच्चारण करते हुए ही वे गुंगु इन नरक के द्वारभूत 'काम-क्रोध-लोभ' को समाप्त कर पाते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - हम क्रियाशील पुरुषों को प्रभु के उपासक पुरुषों की प्रेरणा प्राप्त हो। उनसे प्रेरणा को प्राप्त करके हम प्रभु का स्मरण करते हुए 'काम, क्रोध व लोभ' का विनाश करनेवाले बनें ।

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अहम्) अहं परमात्मा (विक्षु गुङ्गुभ्यः) मनुष्यप्रजासु मदर्थं ये गुङ्गवः-अव्यक्तं शब्दयन्ति गायन्ति मनसि जपन्ति तेभ्यस्तेषां हिताय “गुङ्गाः-अव्यक्तोच्चारणाः” [ऋ० २।३२।८ दयानन्दः]  “गौङ्गवं साम ऊर्ध्वमिव च तिर्यगिव च गीयते सामगैः” [जै० ३।१८५] (अतिथिग्वम्) अतिथिना ज्ञानिनोपासकेन गन्तव्यं प्रापणीयम् (इष्करम्-इषं न धारयम्) इष्टकरमन्नमिव मोक्षसुखम् (वृत्रतुरम्) पापाज्ञाननाशकेन मोक्षसुखं धारयामि (यत् पर्णयघ्ने-उत वा करञ्जहे) यतः पिपर्ति पालयति यः स पर्णोऽहं परमात्मा, तं मां याति प्राप्नोति मदुपासकस्तं यो हन्ति तस्मै, अपि च करं शरणं मदीयं जहाति त्यजति तस्मै नास्तिकाय (महे वृत्रहत्ये-अहं प्र-अशुश्रवि) तद्वधे महते पापनाशनकार्येऽहं प्रकर्षेण श्रुतः-प्रसिद्धोऽस्मि ॥८॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - For the protection and advancement of the unostentatious people of piety and creativity among humanity, I hold and maintain persons and powers that are hospitable, producers of food, and destroyers of sin, evil and violence, and I protect them like the very nourishment of society, since I am known and celebrated for what I am and what I do : eliminate the forces counter to growth, break the cloud for rain, and dispel darkness, want and ignorance.