गुंगु द्वारा पर्णय करञ्ज व वृत्र का नाश
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (अहम्) = मैं (गुङ्गभ्यः) = [ गम् धातु से गंगा की तरह यह गुंगु शब्द बना है] निरन्तर गतिशील पुरुषों के लिये (अतिथिग्वम्) = [अतिथि गच्छति] उस महान् अतिथि प्रभु की ओर चलनेवाले, अर्थात् प्रभु के सतत उपासक, (इष्करम्) = प्रेरणा को देनेवाले (वृत्रतुरम्) = कामवासना को नष्ट करनेवाले पुरुष को (धारयम्) = धारण करता हूँ, प्राप्त करता हूँ । उसी प्रकार प्राप्त करता हूँ (न) = जैसे (विक्षु) = प्रजाओं में (इषम्) = अन्न को । अन्न प्रजाओं के पोषण के लिये होता है, इसी प्रकार इस व्यक्ति की प्रेरणा उन क्रियाशील पुरुषों को अध्यात्म भोजन प्राप्त कराती है। इससे प्रेरणा को प्राप्त करके वे भी प्रभु की ओर चलनेवाले व वासना को नष्ट करके ऊपर उठनेवाले होते हैं । [२] 'पर्णय' एक आसुरी वृत्ति है जो 'पर्णं याति' पंख को प्राप्त करती है, सदा उड़ती है और 'इतना तो है, इतना और हो जाएगा, इस प्रकार सोचनेवाली होती है, यही 'लोभ' है। 'क- रञ्ज' [कं शिरः रञ्जयति reddens] ‘क्रोध' है, यह शिरोभाग को, मुख को लाल-लाल कर देता है। 'वृत्र' = ज्ञान पर आवरण को डालता हुआ 'काम' है । (यत्) = जब गुंगु पुरुष अतिथिग्व की प्रेरणा को सुनकर इन पर्णय आदि का नाश करते हैं तब (पर्णयघ्ने) = लोभ के विनाशक संग्राम में (उत वा) = और (करञ्जहे) = क्रोध के हनन में और (महे वृत्रहत्ये) = इस महान् काम-विनाश रूप कार्य में (अहम्) = मैं (प्र अशुश्रवि) = खूब ही सुना जाता हूँ। प्रभु का स्मरण व नामोच्चारण करते हुए ही वे गुंगु इन नरक के द्वारभूत 'काम-क्रोध-लोभ' को समाप्त कर पाते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - हम क्रियाशील पुरुषों को प्रभु के उपासक पुरुषों की प्रेरणा प्राप्त हो। उनसे प्रेरणा को प्राप्त करके हम प्रभु का स्मरण करते हुए 'काम, क्रोध व लोभ' का विनाश करनेवाले बनें ।