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अ॒हं भु॑वं॒ वसु॑नः पू॒र्व्यस्पति॑र॒हं धना॑नि॒ सं ज॑यामि॒ शश्व॑तः । मां ह॑वन्ते पि॒तरं॒ न ज॒न्तवो॒ऽहं दा॒शुषे॒ वि भ॑जामि॒ भोज॑नम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

aham bhuvaṁ vasunaḥ pūrvyas patir ahaṁ dhanāni saṁ jayāmi śaśvataḥ | māṁ havante pitaraṁ na jantavo haṁ dāśuṣe vi bhajāmi bhojanam ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अ॒हम् । भु॒व॒म् । वसु॑नः । पू॒र्व्यः । पतिः॑ । अ॒हम् । धना॑नि । सम् । ज॒जा॒मि॒ । शश्व॑तः । माम् । ह॒व॒न्ते॒ । पि॒तर॑म् । न । ज॒न्तवः॑ । अ॒हम् । दा॒शुषे॑ । वि । भ॒जा॒मि॒ । भोज॑नम् ॥ १०.४८.१

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ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:48» मन्त्र:1 | अष्टक:8» अध्याय:1» वर्ग:5» मन्त्र:1 | मण्डल:10» अनुवाक:4» मन्त्र:1


ब्रह्ममुनि

इस सूक्त में ‘इन्द्र शब्द से परमेश्वर ग्रहण किया है। वह परमात्मा योगियों, उपासकों, आस्तिकों को मोक्ष प्रदान करता है, उनके साथ मित्रता करता है, वेदज्ञान देता है, दुष्टकर्मों से बचाता है और नास्तिकों को दण्ड देता है, यह वर्णित है।

पदार्थान्वयभाषाः - (अहम्) मैं परमात्मा (वसुनः) मुक्तों के नितान्त वासस्थान मोक्ष का (पूर्व्यः) पुरातन (पतिः) स्वामी हूँ (अहम्) मैं ही (धनानि) लौकिक धनों को (शश्वतः) बहुतेरे जीवगणों को उनकी तृप्ति के लिए (सं जयामि) संरक्षित रखता हूँ-स्वाधीन रखता हूँ (जन्तवः) मनुष्यादि प्राणी (मां पितरं न हवन्ते) मुझे पिता के समान आमन्त्रित करते हैं-पुकारते हैं (अहम्) मैं ही (दाशुषे) अन्यों को देनेवाले के लिए अथवा आत्मसमर्पण करनेवाले के लिए (भोजनम्) लोकसुखकर भोग तथा मोक्षानन्द को (वि भजामि) यथायोग्य विभक्त करके देता हूँ ॥१॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा मुक्तात्माओं के मोक्षरूप वास का पुरातन स्वामी है, प्राणिगणों के लिए विविध धनों और जीवननिर्वाहक भोगों को यथायोग्य देता है ॥१॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

लक्ष्मी - पति 'विष्णु'

पदार्थान्वयभाषाः - [१] प्रभु अपने पुत्र 'वैकुण्ठ इन्द्र' से कहते हैं कि (अहम्) = मैं वसुनः सम्पूर्ण धन का (पूर्व्यः पति:) = मुख्य स्वामी (भुवम्) = हूँ । जीव अल्पज्ञता के कारण अपने को धनों का स्वामी मान बैठता है। प्रभु कहते हैं कि मैं ही (शश्वतः) = सनातन काल से (धनानि) = इन धनों का (संजयामि) = विजय करता हूँ। जीव को हम धनों के विजय का गर्व व्यर्थ ही में हो जाता है। विजेता प्रभु हैं । [२] प्रभु को लोग सामान्यतः उसी प्रकार भूले रहते हैं जैसे कि बच्चा माता-पिता को, खेल में मस्त होने के कारण भूला रहता है। पर भूख लगने पर उसे माँ का स्मरण होता है, वह माता की ओर दौड़ता है। इसी प्रकार (जन्तवः) = प्राणी (मां हवन्ते) = कष्ट आने पर मुझे पुकारते हैं (पितरं न) = जैसे पुत्र पिता को पुकारते हैं। इस प्रकार पुकारा गया (अहम्) = मैं ही (दाशुषे) = अपना मेरे प्रति अर्पण करनेवाले के लिये (भोजनम्) = भोजन को (विभजामि) = विभाग पूर्वक प्राप्त कराता हूँ। उसके लिये आवश्यक भोजन को उसे देता हूँ ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-धनों के स्वामी व विजेता प्रभु हैं । हम पुत्रों को प्रभु आवश्यक भोजन प्राप्त कराते ही हैं।

ब्रह्ममुनि

अत्र ‘इन्द्र’शब्देन परमेश्वरो गृह्यते। स च योगिभ्य उपासकेभ्य आस्तिकेभ्यो मोक्षं प्रयच्छति तैः मित्रतामाचरति वेदवाचं च प्रयच्छति रक्षति च दुष्टकर्मभ्यः। नास्तिकान् दण्डयतीत्यादयो विषयाः सन्ति।

पदार्थान्वयभाषाः - (अहम्) अहं परमात्मा (वसुनः) नितान्तं वसन्ति मुक्तात्मानो यस्मिन् तस्य मोक्षधाम्नो धनभूतस्य (पूर्व्यः) सनातनः (पतिः) स्वामी खल्वस्मि (अहम्) अहमेव परमात्मा (धनानि) लौकिकानि धनानि (शश्वतः) बहोर्गणस्य जीवगणस्य “शश्वत्-बहुनाम” [निघ० ३।१] तृप्तये (संजयामि) संरक्षामि स्वाधीने संस्थापयामि, अतः (जन्तवः) जीवाः मनुष्याः “मनुष्या वै जन्तवः” [श० ७।३।१।३२] (मां पितरं न हवन्ते) मां पितरमिव-आह्वयन्ति (अहम्) अहं हि (दाशुषे) दत्तवतेऽन्येभ्यो दानकर्त्रे यद्वा स्वात्मसमर्पणं कृतवते (भोजनम्) लोकसुखकरं भोगं मोक्षानन्दं च (विभजामि) यथायोग्यं विभज्य प्रयच्छामि ॥१॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - I am the eternal lord, master protector and promoter of the world of existence. I create, raise, protect and rule over the eternal wealths of the world. Living beings call on me as father, mother and saviour guardian. I provide food and sustenance for generous humanity dedicated to service and yajna.