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स॒नद्वा॑जं॒ विप्र॑वीरं॒ तरु॑त्रं धन॒स्पृतं॑ शूशु॒वांसं॑ सु॒दक्ष॑म् । द॒स्यु॒हनं॑ पू॒र्भिद॑मिन्द्र स॒त्यम॒स्मभ्यं॑ चि॒त्रं वृष॑णं र॒यिं दा॑: ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

sanadvājaṁ vipravīraṁ tarutraṁ dhanaspṛtaṁ śūśuvāṁsaṁ sudakṣam | dasyuhanam pūrbhidam indra satyam asmabhyaṁ citraṁ vṛṣaṇaṁ rayiṁ dāḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

स॒नत्ऽवा॑जम् । विप्र॑ऽवीरम् । तरु॑त्रम् । ध॒न॒ऽस्पृत॑म् । शू॒शु॒ऽवांस॑म् । सु॒ऽदक्ष॑म् । द॒स्यु॒हन॑म् । पूः॒ऽभिद॑म् । इ॒न्द्र॒ । स॒त्यम् । अ॒स्मभ्य॑म् । चि॒त्रम् । वृष॑णम् । र॒यिम् । दाः॒ ॥ १०.४७.४

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ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:47» मन्त्र:4 | अष्टक:8» अध्याय:1» वर्ग:3» मन्त्र:4 | मण्डल:10» अनुवाक:4» मन्त्र:4


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सनद्वाजम्) अमृतान्न के सम्भाजक (विप्रवीरम्) मेधावी उपासकोंवाले (तरुतारम्) संसारसागर तरानेवाले, (धनस्पृतम्) धनप्राप्त करानेवाले (शूशुवांसम्) बढ़ानेवाले या व्यापनेवाले (सुदक्षम्) श्रेष्ठ बलवाले (दस्युहनम्) दुष्टनाशक (पूर्भिदम्) पापपुरों-मन की वासना के नाशक (सत्यम्) अविनाशी तुझ परमात्मा को हम जानते हैं-मानते हैं (अस्मभ्यम्) पूर्ववत् ॥४॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा अमृतान्न भोग का दाता, मेधावी लोगों द्वारा उपासनीय, संसारसागर से तरानेवाला, धन को प्राप्त करानेवाला, वर्धक, व्यापक, प्रशस्त बलवाला, दुष्टनाशक, मानसिक वासनाओं को दूर करनेवाला एवं अविनाशी है। वह सबके द्वारा जानने, मानने और उपासना करने योग्य है ॥४॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

शक्तिशाली व ज्ञानी

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (इन्द्र) = परमैश्वर्यशालिन् प्रभो ! (अस्मभ्यम्) = हमारे लिये (रयिं दाः) = पुत्ररूप धन को दीजिये । उस पुत्र रूप धन को जो कि [क] (सनद्वाजम्) = शक्ति को प्राप्त करनेवाला है [वाज-शक्ति सन्=संभजन], [ख] (विप्रवीरम्) = विप्रों में वीर है, अत्यन्त मेधावी है, [ग] (तरुत्रम्) = विघ्नों को तैर जानेवाला है, [घ] (धनस्पृतम्) = धनों का पूरक व धनों का स्रष्टा है, [ङ] (शूशुवांसम्) = सदा वर्धमान है, अपनी शक्तियों का वर्धन करनेवाला है, [च] सुदक्षम् उत्तम दक्षतावाला है, कार्यों को कुशलता से करनेवाला है अथवा उत्तम बलवाला है, [छ] (दस्युहनम्) दस्युओं का नाश करनेवाला है, [ज] (पूर्भिदम्) = शरीररूपी नगरियों का विदारण करनेवाला है, मोक्ष के लिये प्रयत्नशील है, [झ] (सत्यम्) = सत्कर्मों में व्यापृत होनेवाला है अथवा सत्य का पालन करनेवाला है, [ञ] (चित्रम्) = ज्ञान का देनेवाला है तथा [२] (वृषणम्) = शक्तिशाली व दूसरों पर सुखों का वर्षण करनेवाला है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हमें शक्तिशाली व मेधावी पुत्र की प्राप्ति हो ।

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सनद्वाजम्) वाजममृतान्नं सनति सम्भजतीति सनद्वाजम्-अमृतान्नसम्भाजयितारम्, यथा भरद्वाजम्-“प्रजा वै वाजास्ता एष बिभर्ति तस्माद् भरद्वाजः” [ऐ० आ० २।२।२] (विप्रवीरम्) विप्रा उपासका मेधाविनो वीरा वीर्यं धारयमाणा यस्य तम् (तरुत्रम्) भवसागरात् तारकम् (धनस्पृतम् धनं) स्पारयति प्रापयति यस्तम् ‘अन्तर्गतो णिजर्थः’ (शूशुवांसम्) वर्धयितारम्, व्याप्नुवन्तम्, “शूशुवांसं व्याप्नुवन्तम्” [ऋ० ६।१८।२ दयानन्दः] (सुदक्षम्) श्रेष्ठबलवन्तम् (दस्युहनम्) दुष्टनाशकम् (पूर्भिदम्) पापपुरां मनोवृत्तीनां भेत्तारम् (सत्यम्) सत्यमविनाशिनम्, इन्द्र ! त्वां विद्म जानीम (अस्मभ्यम्…) पूर्ववत् ॥४॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - We know you, Indra, abundant in food, energy and advancement, commanding the brave and intelligent, guiding presence over the ocean of existence, infinitely opulent, giver of strength and sure success, most powerful, destroyer of evil and negativity, breaker of mountainous obstructions, ever true and eternal. O lord omnipotent, give us wondrous wealth of life in abundance.