पदार्थान्वयभाषाः - [१] (रेवतः) = ऐश्वर्यवाले (मित्रस्य) = मित्र की (वरुणस्य) = और वरुण की माता-जननी (अदिति:) = अदीना देवमाता (नः) = हमें (विश्वस्मात् अंहसः) = सम्पूर्ण पापों से (पातु) = बचाये। 'मित्र' स्नेह की देवता है और 'वरुण' निर्देषता की। 'सब के प्रति स्नेह व द्वेष का अभाव' ये दो वृत्तियाँ मनुष्य को सांसारिक दृष्टिकोण से भी सम्पन्न बनाती हैं, इसी से यहाँ इनका विशेषण 'रेवत: ' दिया गया है। मूल में अदिति' प्रभु हैं, वे हमें प्रेमवाला व निर्दोष बनाएँ, जिससे जहाँ हम पापों से बचे रहें वहाँ ऐश्वर्य सम्पन्न भी बनें। [२] ऐश्वर्य को पाकर हम (अवृकम्) = लोभ से रहित (स्वर्वत्) = प्रकाशमय व सुखमय (ज्योतिः) = ज्ञान को (नशीमहि) = प्राप्त हों। हम धन सम्पन्न तो हों, परन्तु उस धन का हमें लालच न हो। 'धन तो हो, पर धन का लोभ न हो' तो ही वास्तव में सुखमय प्रकाश की प्राप्ति होती है । [३] इस प्रकार धन तथा निर्लोभता को प्राप्त करके हम (अद्या) = अब (तत् देवानाम् अवः) = उस देवताओं को रक्षण को (वृणीमहे) = वरते हैं। हम अपने अन्दर दिव्यवृत्तियों के धारण के लिये यत्नशील होते हैं |
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम प्रेम व निद्वेषता को धारण करें। लोलुपताशून्य ऐश्वर्यवाले हों ।