पदार्थान्वयभाषाः - [१] गत मन्त्र में प्रार्थना की गई है कि हम सत्य प्रेरणा देनेवाले सविता को प्रेरणा में चलते हुए देव बनें और सौभाग्यशाली जीवनवाले हों। उसी प्रार्थना को परिवर्तित रूप में इस प्रकार करते हैं कि वह सर्वव्यापक, सर्वप्रेरक (सविता) = सम्पूर्ण ऐश्वर्यौवाला प्रभु (पश्चातात्) = पीछे से वही (सविता) = प्रेरक प्रभु (पुरस्तात्) = सामने से वही (सविता) = सब उत्तमताओं को जन्म देनेवाला प्रभु (उत्तरात्तात्) = ऊपर उत्तर से तथा वही सविता जन्मदाता प्रभु (अधरात्तात्) = नीचे से यह (सविता) = उत्पादक प्रभु (नः) = हमारे लिये (सर्वतातिम्) = सब शक्तियों के विस्तार को (सुवतु) = प्रेरित करे । सविता की कृपा से हमारे जीवनों में सब शक्तियों का विस्तार हो । [२] इस शक्ति के विस्तार के द्वारा (सविता) = यह प्रेरक प्रभु (नः) = हमें (दीर्घम् आयुः) = दीर्घ जीवन (रासताम्) = दें शक्तियों के ह्रास से जीवन का ह्रास है, शक्तियों के विस्तार से जीवन का विस्तार है। शक्तियों का विस्तार करते हुए प्रभु हमें दीर्घजीवन प्राप्त कराते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सविता की कृपा से हमारी सब शक्तियों का विस्तार हो और हमें दीर्घजीवन प्राप्त हो । सूक्त के प्रारम्भ में कहा गया है कि सब देवों का अनुकरण करते हुए मैं अपने जीवन को स्वर्गतुल्य बनाता हूँ। [१] मैं स्वस्थ मस्तिष्क व स्वस्थ शरीरवाला बनूँ, [२] हम लोलुपता - शून्य ऐश्वर्यवाले हों, [३] आचार्यों का उपदेश हमारे जीवनों से अशुभवृत्तियों को दूर करे, [४] हमारे जीवन में ज्ञान व भक्ति का समन्वय हो, [५] यज्ञाग्नि व सूर्यरश्मियाँ मिलकर वायुमण्डल के शोधक हों, [६] प्राणसाधना हमारे जीवन को पवित्र व सशक्त बनाये, [७] सोम का भरण हमारे जीवन को सफल करे, [८] हम संविभाग की वृत्ति से प्रभु का उपासन करनेवाले बनें, [९] हम जैत्र क्रतु को प्राप्त करें, [१०] हम देवों की तरह 'महान्, बृहत् व अनर्वा' बनें, [११] प्रभु की प्रेरणा में चलें, [१२] स्नेह व निर्दोषतावाले हों, [१३] सविता से हमें सर्वताति प्राप्त हो और [१४] इस प्रकार हम 'सौर्य अभिलाषा' बन पायें।