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म॒हद॒द्य म॑ह॒तामा वृ॑णीम॒हेऽवो॑ दे॒वानां॑ बृह॒ताम॑न॒र्वणा॑म् । यथा॒ वसु॑ वी॒रजा॑तं॒ नशा॑महै॒ तद्दे॒वाना॒मवो॑ अ॒द्या वृ॑णीमहे ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

mahad adya mahatām ā vṛṇīmahe vo devānām bṛhatām anarvaṇām | yathā vasu vīrajātaṁ naśāmahai tad devānām avo adyā vṛṇīmahe ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

म॒हत् । अ॒द्य । म॒ह॒ताम् । आ । वृ॒णी॒म॒हे॒ । अवः॑ । दे॒वाना॑म् । बृ॒ह॒ताम् । अ॒न॒र्वणा॑म् । यथा॑ । वसु॑ । वी॒रऽजा॑तम् । नशा॑महै । तत् । दे॒वाना॑म् । अवः॑ । अ॒द्य । वृ॒णी॒म॒हे॒ ॥ १०.३६.११

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ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:36» मन्त्र:11 | अष्टक:7» अध्याय:8» वर्ग:11» मन्त्र:1 | मण्डल:10» अनुवाक:3» मन्त्र:11


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अद्य) आज-इस समय (महतां बृहताम्-अनर्वणां देवानाम्) महत्त्ववाले ज्येष्ठ तथा प्रशस्त अपने ज्ञान में दूसरे पर निर्भर न रहनेवाले विज्ञानी महानुभावों के (महत्-अवः-आ वृणीमहे) उत्कृष्ट श्रवणज्ञान को भली-भाँति अपने अन्दर धारण करते हैं, (यथा) जिससे कि (वीरजातं वसु नशामहे) प्राण आदि इन्द्रियों में बसानेवाले बल को प्राप्त करें। (तद्देवा०) आगे पूर्ववत् ॥११॥
भावार्थभाषाः - गुणी श्रेष्ठ महाविद्वानों द्वारा ज्ञान का श्रवण कर प्राण आदि के बल को सुसम्पन्न करें ॥११॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

वीरजात वसु की प्राप्ति

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (अद्य) = आज (महताम्) = महान्, पूजा के योग्य (बृहताम्) = शरीर, मन व मस्तिष्क के दृष्टिकोण से वृद्धि को प्राप्त (अनर्वणाम्) = हिंसा की वृत्ति से रहित (देवानाम्) = देवों के (महत् अवः) = महनीय रक्षण का (आवृणीमहे) = वरण करते हैं (यथा) = जिससे कि (वीरजातम्) = वीरों के जन्म देनेवाले (वसु) = धन को (नशामहै) = हम प्राप्त करें। [२] देवों के लक्षणों में प्रथम लक्षण है 'महतां', देव महान् होते हैं, विशाल हृदयवाले होते हैं। दूसरा लक्ष्ण 'बृहतां' शब्द से सूचित हुआ है। ये 'बृहि वृद्धौ' शरीर, मन व मस्तिष्क के दृष्टिकोण से उन्नत होते हैं। तीसरा लक्षण 'अनर्वणाम्' शब्द से कहा गया है, ये हिंसा की वृत्ति से दूर होते हैं । [३] इन देवताओं के सम्पर्क में हमारा जीवन भी इसी प्रकार का बनेगा और इस प्रकार हम अपने जीवन में उस (वसु) = धन को प्राप्त करेंगे जो हमें वीर बनानेवाला होगा। [४] इस प्रकार वसु का सम्पादन करते हुए हम (अद्या) = आज (देवानाम्) = देवों (तद् अवः) = उस रक्षण का (वृणीमहे) = वरण करते हैं। हम अपने जीवनों में दिव्यता को सुरक्षित करने के लिये यत्नशील होते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - देव 'महान् बृहत् व अनर्वा' हैं। हमें इनका रक्षण प्राप्त हो ।

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अद्य) अस्मिन्काले (महतां बृहताम्-अनर्वणां देवानाम्) महत्त्ववतां ज्येष्ठानां तथाऽनर्वणां प्रशस्तानामपितु स्वज्ञानेऽन्यस्मिन्ननाश्रितानां महज्ज्ञानिनाम् “अनर्वाऽप्रत्यृतो-ऽन्यस्मिन्” [निरु० ६।२३] विदुषाम् (महत् अवः-आवृणीमहे) उत्कृष्टं श्रवणं ज्ञानं “अव रक्षण…श्रवण……वृद्धिषु” [भ्वादि०] समन्तात् स्वीकुर्मो धारयामः (यथा) यतो हि (वीरजातं वसु नशामहै) वीरेषु प्राणेषु-इन्द्रियेषु जातं वासयितृ बलं प्राप्नुयाम अग्रे पूर्ववत् ॥११॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Today, the grandeur of the great we ask for, of our own choice, and the protection of the grand progressive and irresistible divinities we pray for, so that we may acquire the security and stability created and established by brave generations of humanity: that is the favour and prayer of our choice for protection of the divinities we ask for this day. 11. Today, the grandeur of the great we ask for, of our own choice, and the protection of the grand progressive and irresistible divinities we pray for, so that we may acquire the security and stability created and established by brave generations of humanity: that is the favour and prayer of our choice for protection of the divinities we ask for this day.