पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यत्) = जब (मनुष्याः) = मननपूर्वक कर्मों को करनेवाले हम (देवानाम्) = सूर्य, चन्द्र आदि देवों का (अमन्महि) = ज्ञान प्राप्त करते हैं और इनकी गतियों में ऋत का दर्शन करते, अपनी इन्द्रियों से भी ऋतस्य (प्रवाचनम्) = ऋत का ही उच्चारण करवाते हैं, अर्थात् सब इन्द्रियों से सब कार्यों को बड़ी नियमितता से करते हैं, तो (तत्) = वह ऋत का प्रवाचन सब कार्यों का समय पर करना (मा पिपर्तु) = मेरा पालन व पूरण करे। ऋत के पालन से मेरा शरीर रोगों से आक्रान्त न हो और मेरे मन में किसी प्रकार की न्यूनता न आ जाये। वस्तुतः 'स्वस्ति पन्थामनुचरेम सूर्याचन्द्रमसाविव'=सूर्य व चन्द्रमा की तरह हम बड़े नियम से अपने मार्ग का आक्रमण करें, इसी में कल्याण है। [२] इस ऋत के पालन के होने पर (विश्वाः) = सब (उस्त्रा:) = प्रकाशों को (स्पट्) = स्पर्श करता हुआ (सूर्य:) = ज्ञान का सूर्य (इत् उदेति) = निश्चित ही हमारे जीवन के आकाश में उदित होता है। ऋत का पालन ज्ञान के प्रकाश की अभिवृद्धि का कारण हो जाता है । [३] हम प्रतिदिन (समिधानं अग्निम्) = समिद्ध की जाती हुई अग्नि से (स्वस्ति ईमहे) = कल्याम की याचना करते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम सूर्यादि देवों का मनन करते हुए अपने जीवन में ऋत का पालन करें। यह ऋत हमारे जीवन को प्रकाशमय बनाये ।