विश्वे॑ अ॒द्य म॒रुतो॒ विश्व॑ ऊ॒ती विश्वे॑ भवन्त्व॒ग्नय॒: समि॑द्धाः । विश्वे॑ नो दे॒वा अव॒सा ग॑मन्तु॒ विश्व॑मस्तु॒ द्रवि॑णं॒ वाजो॑ अ॒स्मे ॥
viśve adya maruto viśva ūtī viśve bhavantv agnayaḥ samiddhāḥ | viśve no devā avasā gamantu viśvam astu draviṇaṁ vājo asme ||
विश्वे॑ । अ॒द्य । म॒रुतः॑ । विश्वे॑ । ऊ॒ती । विश्वे॑ । भ॒व॒न्तु॒ । अ॒ग्नयः॑ । सम्ऽइ॑द्धाः । विश्वे॑ । नः॒ । दे॒वाः । अ॒व॒सा । आ । ग॒म॒न्तु॒ । विश्व॑म् । अ॒स्तु॒ । द्रवि॑णम् । वाजः॑ । अ॒स्मे इति॑ ॥ १०.३५.१३
ब्रह्ममुनि
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
[१] (अद्य) = आज (विश्वे) = सब (मरुतः) = प्राण (समिद्धा:) = दीप्त (भवन्तु) = हों और (विश्वे) = ये सब प्राण (ऊती) = रक्षण के लिये (भवन्तु) = हों। हमारे घरों में (विश्वे अग्नयः) = सब यज्ञों की अग्नियाँ (समिद्धाः भवन्तु) = समिद्ध हों। वे यज्ञाग्नियाँ कभी बुझे नहीं। हम प्राणायाम के द्वारा प्राणसाधना को करनेवाले हों और अग्निहोत्र के द्वारा घर के वायुमण्डल का शोधन करें। (२) ऐसा करने पर, अर्थात् प्राणायाम व अग्निहोत्र के अपनाने पर (विश्वे) = सब (देवः) = देव (नः) = हमें (अवसा) = रक्षण के हेतु से (गमन्तु) = प्राप्त हों । प्राणसाधना व अग्निहोत्र से सब आन्तर व बाह्य देवों का आनुकूल्य प्राप्त होता है और ये देव हमारा रक्षण करनेवाले होते हैं। (३) देवों के रक्षण के परिणामस्वरूप (विश्वं द्रविणम्) = सम्पूर्ण धन व (वाजः) = शक्ति व ज्ञान (अस्ये) = हमारे में (अस्तु) = हो । शक्ति व ज्ञान हमारी आन्तर सम्पत्ति हो और धन हमारी बाह्य समृद्धि का कारण बने। इस प्रकार हम प्राणायाम से शक्ति व ज्ञान की सम्पत्ति का लाभ प्राप्त करें तो अग्निहोत्र से उचित वर्षण के द्वारा अन्नादि की समृद्धिवाले हों ।
