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विश्वे॑ अ॒द्य म॒रुतो॒ विश्व॑ ऊ॒ती विश्वे॑ भवन्त्व॒ग्नय॒: समि॑द्धाः । विश्वे॑ नो दे॒वा अव॒सा ग॑मन्तु॒ विश्व॑मस्तु॒ द्रवि॑णं॒ वाजो॑ अ॒स्मे ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

viśve adya maruto viśva ūtī viśve bhavantv agnayaḥ samiddhāḥ | viśve no devā avasā gamantu viśvam astu draviṇaṁ vājo asme ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

विश्वे॑ । अ॒द्य । म॒रुतः॑ । विश्वे॑ । ऊ॒ती । विश्वे॑ । भ॒व॒न्तु॒ । अ॒ग्नयः॑ । सम्ऽइ॑द्धाः । विश्वे॑ । नः॒ । दे॒वाः । अ॒व॒सा । आ । ग॒म॒न्तु॒ । विश्व॑म् । अ॒स्तु॒ । द्रवि॑णम् । वाजः॑ । अ॒स्मे इति॑ ॥ १०.३५.१३

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ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:35» मन्त्र:13 | अष्टक:7» अध्याय:8» वर्ग:8» मन्त्र:3 | मण्डल:10» अनुवाक:3» मन्त्र:13


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अद्य) इस जीवन में या जन्म में (विश्वे मरुतः) सारे प्राण (विश्वे) सारे शरीराङ्ग (विश्वे समिद्धाः-अग्नयः) सब सम्यक् प्रकाशमान सूर्यादि पदार्थ (ऊती भवन्तु) रक्षा के लिये हों (विश्वे देवाः-नः-अवसा-आ गमन्तु) सब विद्वान् हमारे रक्षण के हेतु आवें-प्राप्त होवें (विश्वं द्रविणं वाजः-अस्मे-अस्तु) सब विद्यादि धन और बल हमारे लिये उपयुक्त हों ॥१३॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा ने प्राण और शरीर के अन्य अङ्ग तथा सूर्यादि प्रकाशमान पदार्थ जीवनरक्षा के लिये प्रदान किये हैं। विद्वान् जन भी हमारी रक्षा करते हैं। विद्यादि धन और बल हमारे उपयोग के लिये हैं ॥१३॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

[१] (अद्य) = आज (विश्वे) = सब (मरुतः) = प्राण (समिद्धा:) = दीप्त (भवन्तु) = हों और (विश्वे) = ये सब प्राण (ऊती) = रक्षण के लिये (भवन्तु) = हों। हमारे घरों में (विश्वे अग्नयः) = सब यज्ञों की अग्नियाँ (समिद्धाः भवन्तु) = समिद्ध हों। वे यज्ञाग्नियाँ कभी बुझे नहीं। हम प्राणायाम के द्वारा प्राणसाधना को करनेवाले हों और अग्निहोत्र के द्वारा घर के वायुमण्डल का शोधन करें। (२) ऐसा करने पर, अर्थात् प्राणायाम व अग्निहोत्र के अपनाने पर (विश्वे) = सब (देवः) = देव (नः) = हमें (अवसा) = रक्षण के हेतु से (गमन्तु) = प्राप्त हों । प्राणसाधना व अग्निहोत्र से सब आन्तर व बाह्य देवों का आनुकूल्य प्राप्त होता है और ये देव हमारा रक्षण करनेवाले होते हैं। (३) देवों के रक्षण के परिणामस्वरूप (विश्वं द्रविणम्) = सम्पूर्ण धन व (वाजः) = शक्ति व ज्ञान (अस्ये) = हमारे में (अस्तु) = हो । शक्ति व ज्ञान हमारी आन्तर सम्पत्ति हो और धन हमारी बाह्य समृद्धि का कारण बने। इस प्रकार हम प्राणायाम से शक्ति व ज्ञान की सम्पत्ति का लाभ प्राप्त करें तो अग्निहोत्र से उचित वर्षण के द्वारा अन्नादि की समृद्धिवाले हों ।

पदार्थान्वयभाषाः - भावार्थ- प्राणायाम हमें 'शक्ति व ज्ञान' रूप आन्तर सम्पत्ति को प्राप्त कराये तथा अग्निहोत्र हमें आद्य अन्नों को प्राप्त कराता हुआ समृद्ध करनेवाला हो ।

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अद्य) अस्मिन् जीवने जन्मनि वा (विश्वे मरुतः) सर्वे प्राणाः “मरुतः प्राणादयः” [ऋ०१।५२।९ दयानन्दः] (विश्वे) सर्वे शरीरावयवाः (विश्वे समिद्धाः-अग्नयः) सर्वे सम्यक् प्रकाशमानसूर्यादयः पदार्थाः (ऊती भवन्तु) ऊत्यै रक्षणाय भवन्तु (विश्वे देवाः नः-अवसा-आ गमन्तु) सर्वे विद्वांसश्चास्माकं रक्षणहेतुनाऽऽगच्छन्तु-प्राप्ता भवन्तु (विश्वं द्रविणं वाजः-अस्मे-अस्तु) सर्वं विद्यादिधनं बलं चास्मभ्यमुपयुक्तं भवतु ॥१३॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Today in this life of ours, may all the winds and pranic energies and all lighted fires of the world bring us all protections and promotions. May all divine powers of nature and humanity in the world come with all protection, power and progress. May all wealth, honour and excellence of the world, all speed, success and victory be our common human heritage, good fortune and universal victory.