'सुप्रवाचन - सुभर- नृपाय्य' घर .
पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (देवाः) = गत मन्त्रों में वर्णित देवो! (आदित्या:) = आप सब ज्ञानों व उत्तमताओं का आदान करनेवाले हो आप (नः) = हमें (तत् छर्दिः) = वह घर यच्छता दीजिये । जो [क] (सुप्रवाचनम्) = प्रभु के गुणों के उत्तम प्रवचनवाला है। जिसमें प्रभु के गुणों का गान होता है अथवा जिसमें सदा शुभ ही शब्द बोले जाते हैं। [ख] (सुभरम्) = जो उत्तम भरण व पोषणवाला है, जो समृद्ध है, जिसमें खान-पान की किसी भी प्रकार से कमी नहीं है। [ग] (नृपाय्यम्) = जो घरों- नरों का रक्षण करनेवाला है, जिस घर में नरों का वास है, उनका जो [नृ नये] निरन्तर अपने को आगे ले-चल रहे हैं । [२] ऐसे घर में निवास करते हुए हम (पश्वे) = अपने गौ आदि पशुओं के लिये, (तोकाय) = अपने सन्तानों के लिये (तनयाय) = पौत्रों के लिये तथा जीवसे उत्तम दीर्घ जीवन के लिये (समिधानं अग्निम्) = समिद्ध की जाती हुई अग्नि से (स्वस्ति ईमहे) = कल्याण की याचना करते हैं । 'सुप्रवाचन - सुभर - नृपाय्य' घर में हम नियमपूर्वक अग्निहोत्र करें। इस अग्निहोत्र से वायुमण्डल की शुद्धि होकर उस घर में सभी स्वस्थ हों। हमारे पशुओं की स्थिति भी उत्तम हो, हमारे पुत्र-पौत्र अच्छे हों और हमारा जीवन भी दीर्घ हो ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- देव कृपा से हम 'सुप्रवाचन- सुभर नृपाय्य' घर को प्राप्त करें। उस घर में हम नियम से अग्निहोत्र करें।