'बृहस्पति - पूषा - अश्विनौ - भग'
पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (आदित्याः) = सब ज्ञानों व अच्छाइयों का आदान करनेवाले देवो! (ते) = वे आप (सर्वतातये) = हमारे में सब गुणों के विकास के लिये (आगता) = आइये । देवों के सम्पर्क में आकर हम भी देव बनते हैं, हमारे में सब दिव्य गुणों का विकास होता है। जैसों के साथ हमारा उठना- बैठना होता है वैसे ही हम बनते हैं । [२] हे देवो! आप (सजोषसः) = समानरूप से प्रीतिवाले होते हुए (नः) = हमारे (वृधे) = वर्धन के लिये (यज्ञं अवता) = हमारे से किये जाते हुए यज्ञों का रक्षण करिये। आपकी कृपा से हमारी यज्ञिय वृत्ति सदा बनी रहे । [३] हम (बृहस्पतिम्) = ज्ञान के अधिष्ठातृदेव बृहस्पति से (पूषणम्) = पुष्टि के देवता पूषा से, अश्विना प्राणापान से, (भगम्) = ऐश्वर्य के देवता भग से, (समिधानं अग्निम्) = अग्निहोत्र में समिद्ध की जाती हुई अग्नि से (स्वस्ति ईमहे) = कल्याण व उत्तम स्थिति की याचना करते हैं । वस्तुतः जीवन के उत्कर्ष के लिये आवश्यक है कि हम बृहस्पति आदि देवों की आराधना करें। 'ऊँचे से ऊँचा ज्ञान प्राप्त करें' यही बृहस्पति की आराधना है । इसी प्रकार शरीर के उचित पोषण से 'पूषा' की तथा प्राणापान की शक्ति की वृद्धि के द्वारा हम ' अश्विना' की आराधना करें। सुपथ से ऐश्वर्य की वृद्धि करते हुए 'भग' के उपासक हों और प्रातः- सायं अग्निहोत्र करते हुए अग्नि का पूजन करें । यही कल्याण प्राप्ति का मार्ग है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - हम 'बृहस्पति, पूषा, अश्विनौ, भग' के उपासक बनें।