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न दे॒वाना॒मति॑ व्र॒तं श॒तात्मा॑ च॒न जी॑वति । तथा॑ यु॒जा वि वा॑वृते ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
na devānām ati vrataṁ śatātmā cana jīvati | tathā yujā vi vāvṛte ||
पद पाठ
न । दे॒वाना॑म् । अति॑ । व्र॒तम् । श॒तऽआ॑त्मा । च॒न । जी॒व॒ति॒ । तथा॑ । यु॒जा । वि । व॒वृ॒ते॒ ॥ १०.३३.९
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ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:33» मन्त्र:9
| अष्टक:7» अध्याय:8» वर्ग:2» मन्त्र:4
| मण्डल:10» अनुवाक:3» मन्त्र:9
ब्रह्ममुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (देवानां व्रतम्-अति न शतात्मा चन जीवति) विद्वानों के उपदिष्ट आचरण को तथा दिव्य पदार्थों के नियम को लाँघकर-तोड़कर सौ वर्ष आयुवाला कोई भी जी नहीं सकता (तथा युजा विवावृते) वैसे ही समागमयोग्य परमात्मा से वियुक्त हो जाता है ॥९॥
भावार्थभाषाः - विद्वानों द्वारा उपदिष्ट आचरण तथा अग्नि सूर्य आदि पदार्थों के नियमों को तोड़कर सौ वर्ष की आयु को कोई प्राप्त नहीं कर सकता और परमात्मा के समागम से भी उसे अलग होना पड़ता है ॥९॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
घर की ओर लौटना
पदार्थान्वयभाषाः - [१] मनुष्य यदि मृत्यु का स्मरण करता है तो अहंकार को जीत लेता है, यह मृत्यु स्मरण उसे प्रभु से भी दूर नहीं होने देता। सो मनुष्य को यह स्मरण रखना चाहिये कि (शतात्मा चन) = शत वर्षपर्यन्त जीवनवाला यह व्यक्ति भी (देवानां व्रतम्) = देवों के नियम को (न अतिजीवति) = लाँघकर नहीं जीता है, अर्थात् मनुष्य मरणधर्मा है, मृत्यु तो अवश्य आनी ही है। इस मृत्यु को कोई लाँघ नहीं सकता। यदि मनुष्य इस मृत्यु को न भूलेगा तो विषयों में न फँसेगा । [२] उस समय (तथा) = विषयों में न फँसने पर (युजा) = अपने उस प्रभुरूप मित्र के साथ रहता हुआ (विवावृते) = यह इस पृथ्वीलोक के वास को समाप्त करके अपने घर में लौट जाता है। फिर से ब्रह्मलोक को प्राप्त कर लेता है । यह ब्रह्मलोक प्राप्ति ही मोक्ष है। यहाँ पहुँचता वही है जो प्रकृति का मित्र न होता हुआ प्रभु का मित्र बनता है। प्रभु का मित्र वही बनता है जो मृत्यु को नहीं भूलता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - शरीर की नश्वरता का स्मरण करते हुए हम प्रभु के मित्र बनें और भोगों में न फँसकर अपने गृह ब्रह्मलोक की ओर लौटनेवाले बनें । सूक्त का प्रारम्भ इस प्रकार हुआ है कि हम लोकहित के कार्यों में लगे रहें। [१] इन कार्यों में लगने पर क्षुधा, तृषा आदि शतशः कष्टों से हमारे धैर्य की परीक्षा होगी, [२] हम घबराकर प्रभु से कल्याण की प्रार्थना करेंगे, [३] प्रभु कहेंगे कि मुझे तो वही प्रिय है जो 'मेरी प्रेरणा को सुने और करे', [४] जो दमन व दान को अपनाये, [५] वाणी में माधुर्य को धारण करे, [६] प्रभु कहते हैं कि मैं उसकी प्रशंसा करता हूँ जो रक्षक बनता है, [७] जीव की प्रार्थना यही होनी चाहिए कि वह चक्रवर्ती भी बन जाए तो प्रभु को भूले नहीं, [८] न भूलेंगे तो घर की ओर लौटेंगे ही, [९] अन्यथा जूए आदि व्यसनों में फँसकर विचित्र-सा जीवन बिता रहे होंगे ।
ब्रह्ममुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (देवानां व्रतम्-अति न शतात्मा चन जीवति) विदुषां दिव्यपदार्थानां कर्मनियमं वाऽतिक्रम्य नहि शतसंवत्सरः शतसंवत्सरायुष्कः “संवत्सर आत्मा” [तै० सं०७।५।२५।१] कश्चन जीवति (तथा युजा विवावृते) तथैव योक्तव्येन परमात्मना च वियुज्यते वियुक्तो भवति ॥९॥
डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - No soul of a hundred year life on earth, even if it had a hundred lives, can live beyond the laws of nature and divinity, therefore it has to leave and return to life with its natural concomitants of body and mind again and again in the cycle.
