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यदीशी॑या॒मृता॑नामु॒त वा॒ मर्त्या॑नाम् । जीवे॒दिन्म॒घवा॒ मम॑ ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
yad īśīyāmṛtānām uta vā martyānām | jīved in maghavā mama ||
पद पाठ
यत् । ईशी॑य । अ॒मृता॑नाम् । उ॒त । वा॒ । मर्त्या॑नाम् । जीवे॑त् । इ॒त् । म॒घऽवा॑ । मम॑ ॥ १०.३३.८
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ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:33» मन्त्र:8
| अष्टक:7» अध्याय:8» वर्ग:2» मन्त्र:3
| मण्डल:10» अनुवाक:3» मन्त्र:8
ब्रह्ममुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (अमृतानाम्-उत वा मर्त्यानां यत्-ईशीय) हे परमात्मन् ! मोक्षसुखों तथा सांसारिक सुखों का भी मैं स्वामी हो जाऊँ, तो (मम मघवा जीवेत्-इत्) मेरा आत्मा-जीवात्मा जीता है, ऐसा मैं समझता हूँ॥ ८॥
भावार्थभाषाः - मानव का संसार में जीना सफल तभी समझा जाता है, जब कि वह सांसारिक सुखलाभ लेने के साथ अमृत-मोक्ष सुख का भी अपने को पात्र या अधिकारी बनावे॥ ८॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
चक्रवर्तिता व प्रभु स्मरण
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यत्) = यदि (अमृतानाम्) = देवों का (उतवा) = अथवा (मर्त्यानाम्) = मनुष्यों का मैं (ईशीय) = स्वामी हो जाऊँ तो भी (मम मघवा जीवेत् इत) = मेरे में उस ऐश्वर्यों के स्वामी प्रभु की भावना बनी ही रहे। प्रभु के स्मरण से मैं दूर न हो जाऊँ। [२] देवों व मनुष्यों का ईश बनने का भाव यह है कि मैं इस पृथ्वी का चक्रवर्ती राजा बन जाऊँ अथवा देवलोक का राज्य भी प्राप्त कर लूँ। मैं अहंकार में आकर प्रभु को न भूल जाऊँ । यह सम्पत्ति का हिरण्मय पात्र मेरी आँख पर आवरण के रूप में न हो जाए। इस सम्पत्ति से गर्वित होकर 'मैं ही मैं' न हो जाऊँ प्रभु के स्मरण से सदा विनीत बना रहूँ और अनुभव करूँ कि यह सब सम्पत्ति उस प्रभु की ही है। यह लक्ष्मी मेरे लिये सहायक व पालक हो सकती है, मैं इसका स्वामी नहीं हूँ ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सांसारिक ऐश्वर्य मेरी आँख पर पर्दा न डाल दे, मैं प्रभु को भूल न जाऊँ ।
ब्रह्ममुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (अमृतानाम्-उत वा मर्त्यानां यत्-ईशीय) हे परमात्मन् ! मोक्षसुखानां तथा चापि संसारसुखानामहं यदपि स्वामित्वं कुर्याम्, अभ्युदयनिःश्रेयस-सुखानां स्वामी भवेयं तर्हि (मम मघवा जीवेत्-इत्) ममात्मा जीवतीति मन्येऽहम् ॥८॥
डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - If I were master controller and ruler of the mortal as well as of the immortal principles and elements of my existence, then I would be really alive in all my power and potential for all time.
