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अक्षे॑त्रवित्क्षेत्र॒विदं॒ ह्यप्रा॒ट् स प्रैति॑ क्षेत्र॒विदानु॑शिष्टः । ए॒तद्वै भ॒द्रम॑नु॒शास॑नस्यो॒त स्रु॒तिं वि॑न्दत्यञ्ज॒सीना॑म् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

akṣetravit kṣetravidaṁ hy aprāṭ sa praiti kṣetravidānuśiṣṭaḥ | etad vai bhadram anuśāsanasyota srutiṁ vindaty añjasīnām ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अक्षे॑त्रऽवित् । क्षे॒त्र॒ऽविद॑म् । हि । अप्रा॑ट् । सः । प्र । ए॒ति॒ । क्षे॒त्र॒ऽविदा॑ । अनु॑ऽशिष्टः । ए॒तत् । वै॒ । भ॒द्रम् । अ॒नु॒ऽशास॑नस्य । उ॒त । स्रु॒तिम् । वि॒न्द॒ति॒ । अ॒ञ्ज॒सीना॑म् ॥ १०.३२.७

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ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:32» मन्त्र:7 | अष्टक:7» अध्याय:7» वर्ग:30» मन्त्र:2 | मण्डल:10» अनुवाक:3» मन्त्र:7


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अक्षेत्रवित्-क्षेत्रविदं हि-अप्राट्) जो किसी ज्ञानक्षेत्र को नहीं जानता है, वह उस ज्ञानक्षेत्र के वेत्ता को पूछता है (सः-क्षेत्रविदा-अनुशिष्टः प्र एति) वह उस ज्ञानक्षेत्र के वेत्ता से शिक्षा पाया हुआ उस ज्ञानक्षेत्र को प्राप्त होता है (एतत्-वै-भद्रम्) यह कल्याणकारी या सेवनीय वस्तु है (उत) और (अञ्जसीनां स्रुतिं विन्दति) प्रसिद्ध पद्धतियों की सरणी-रीति को मनुष्य परम्परा से प्राप्त होता है ॥७॥
भावार्थभाषाः - किसी विद्याविशेष को जाननेवाला उसके जाननेवाले के पास जाकर ज्ञान प्राप्त करे, यह कल्याणकारी व्यवहार है और परम्परा से चली आई पद्धतियों में रीति है ॥७॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

मार्ग - ज्ञान

पदार्थान्वयभाषाः - [१] 'क्षीयते गम्यतेऽनेन इति क्षेत्रं मार्गः ' (अक्षेत्रवित्) = मार्ग को न जाननेवाला पुरुष (क्षेत्रविदम्) = मार्ग को जाननेवाले को (हि) = निश्चय से (अप्राट्) = पूछता है और (सः) = वह (क्षेत्रविदा) = मार्गज्ञ से (अनुशिष्टः) = उपदिष्ट हुआ हुआ (प्रैति) = प्रकर्षेण अपने मार्ग पर चलता है। क्षेत्रवित् के न मिलने पर भटकने की आशंका बनी ही रहती है। [२] (एतद् वै) = यह ही (अनुशासनस्य) = उपदेश का (भद्रम्) = कल्याण है कि (अञ्जसीनाम्) = सरलता से जाने योग्य ऋजु कर्मों के (स्रुतिम्) = मार्ग को (विन्दति) = पा लेता है, अर्थात् क्षेत्रविदों से अनुशिष्ट हुआ हुआ व्यक्ति अकल्याण के मार्ग का कभी आक्रमण नहीं करता ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - क्षेत्रवित् से उपदेश को प्राप्त करके मनुष्य भद्र मार्ग का ही आक्रमण करता है।

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अक्षेत्रवित्-क्षेत्रविदं हि-अप्राट्) यः खलु किमपि क्षेत्रं ज्ञानक्षेत्रं न जानाति स खल्वन्यं तत्क्षेत्रस्य ज्ञानक्षेत्रस्य वेत्तारं पृच्छति हि (सः-क्षेत्रविदा-अनुशिष्टः प्रैति) स तत्क्षेत्रवेत्ता लब्धशिक्षः सन् तत् क्षेत्रं ज्ञानक्षेत्रं प्राप्नोति (एतत्-वै भद्रम्) एतत् खलु भद्रं कल्याणकरं भजनीयं वा वस्तु (उत) अपि च (अञ्जसीनां स्रुतिं विन्दति) प्रसिद्धानां पद्धतीनाम् “अञ्जसी प्रसिद्धा’ [ऋक्० १।१०४।४ दयानन्दः] स्रुतिं सरणिं जनः परम्परया प्राप्नोति ॥७॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Let the man ignorant of the field of life ask the teacher who knows the field and facts of life and who can communicate, and, thus taught and trained, go forward in the business of living. This only is the holy and auspicious end and aim of teaching and training for life. And this is the way of the evolution and development of tradition by which man gets enlightened on way to progress.