पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे प्रभो! आप (इत्) = निश्चय से (तत्) = उस (सधस्थम्) = आत्मा और परमात्मा के मिलकर बैठने के स्थान 'हृदय' को (चारु) = सुन्दरता से (अभि दीधय) = दीप्त करिये। इस प्रकार हमारे इस हृदय को ज्ञान से दीप्त करिये (यत्) = कि (धेनवः गा)वः = विषयों के द्वारा प्रीणित करनेवाली इन्द्रियरूप गौवें (वहतुम्) = हमारे विवाह सम्बन्धों को (न शासन्) = न शासित करनेवाली हों, अर्थात् इन्द्रियों के द्वारा विषयों के भोग ही वैवाहिक जीवन में प्रधान स्थान न ले लें। हमारा हृदय दीप्त हो और इस प्रकार दीत हो कि हमारा वैवाहिक जीवन भी पवित्र बना रहे । [२] (माता) = माता वही है जो कि (मन्तुः) = आज्ञा को माननेवाले पुत्र को (यूथस्य पूर्व्या) = बाल समूह में पूर्व स्थान प्राप्त कराने में उत्तम है । अचानक किन्हीं पूर्व संस्कारों के कारण बच्चा कहना ही न माननेवाला हो तो माता के लिये उसे उन्नत करना कठिन हो जाता है, परन्तु सामान्य स्थिति में माता का पूर्ण प्रयत्न यही होना चाहिए कि उसका सन्तान बाल समूह में अग्रणी हो। इसी निर्माण में माता का मातृत्व है । [३] (जन:) = विकासशील मनुष्य वही हैं जो (वाणस्य अभि) = स्तुति शब्दों का लक्ष्य करके (सप्तधातुः) = सात छन्दोंवाली वेदवाणी को धारण करता है [ धार्यन्ते कर्माणि एभिः इति धातव: छन्दांसि ] इन सात छन्दोंवाली वेदवाणी के द्वारा वह प्रभु का गुणगान करता हुआ अपने जीवन के लक्ष्य को ऊँचा बनाता है इसी प्रकार उसके जीवन की शक्तियों का विकास होता है और उसका जन यह नाम अन्यर्थक होता है। 'सप्तधातु' शब्द का अर्थ 'रस, रुधिर, मांस, अस्थि, मेदस्, मज्जा, वीर्य' इन 'सात धातुओंवाला' भी है। विकास के लिये इन सातों धातुओं का ठीक होना आवश्यक है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु हमारे हृदय को ऐसा दीप्त करें कि हमारा गृहस्थ जीवन भी बड़ा पवित्र हो । हम माता बनें तो निर्माण करनेवाली हों। जन हों तो 'सप्तधातु' बनकर जन नाम को अन्वर्थक करें ।