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तदिन्मे॑ छन्त्स॒द्वपु॑षो॒ वपु॑ष्टरं पु॒त्रो यज्जानं॑ पि॒त्रोर॒धीय॑ति । जा॒या पतिं॑ वहति व॒ग्नुना॑ सु॒मत्पुं॒स इद्भ॒द्रो व॑ह॒तुः परि॑ष्कृतः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

tad in me chantsad vapuṣo vapuṣṭaram putro yaj jānam pitror adhīyati | jāyā patiṁ vahati vagnunā sumat puṁsa id bhadro vahatuḥ pariṣkṛtaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

तत् । इत् । मे॒ । छ॒न्त्स॒त् । वपु॑षः । वपुः॑ऽतरम् । पु॒त्रः । यत् । जान॑म् । पि॒त्रोः । अ॒धि॒ऽइय॑ति । जा॒या । पति॑म् । व॒ह॒ति॒ । व॒नुना॑ । सु॒ऽमत् । पुं॒सः । इत् । भ॒द्रः । व॒ह॒तुः । परि॑ऽकृतः ॥ १०.३२.३

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ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:32» मन्त्र:3 | अष्टक:7» अध्याय:7» वर्ग:29» मन्त्र:3 | मण्डल:10» अनुवाक:3» मन्त्र:3


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (पित्रोः पुत्रः यत्-जानम्-अधि-इयति) माता-पिता का पुत्र जब जन्म धारण करता है, (तत्-इत्-मे-वपुषः-वपुष्टरं छन्त्सत्) उसी समय मुझ सुन्दर गृहस्थ से सुन्दर सुख परमात्मा मेरे लिये चाहे-प्राप्त कराये (वग्नुना जाया पतिं वहति) अतः उसकी स्तुतिवाणी से-उसकी कृपा से पत्नी मुझ पति को प्राप्त होती है (सुमत् पुंसः-इत्) उत्तम हर्षप्रद सुख पुरुष का भी प्राप्त होता है (भद्रः-वहतुः परिष्कृतः) गृहस्थ आश्रम यह भजनीय-प्रापणीय उत्तम परिणाम है ॥३॥
भावार्थभाषाः - पति-पत्नी का सम्बन्ध होना गृहस्थ आश्रम कहलाता है और वह सन्तान की उत्पत्ति के लिये है। वह उसका सच्चा सुख है। सुयोग्य पत्नी और सुयोग्य पति ईश्वर की कृपा से प्राप्त होते हैं। यही गृहस्थ का सुन्दर फल है ॥३॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'भक्त', 'पुत्र', 'जाया' व 'भद्र पुरुष' का लक्षण

पदार्थान्वयभाषाः - [१] प्रभु कहते हैं कि (तत्) = वह (इत्) = ही (मे) = मेरा है, वही मेरा सच्चा भक्त अपत्य है, जो कि (वपुषः वपुष्टरम्) = अच्छे से अच्छे शरीर की (छन्त्सत्) = कामना करता है। प्रभु का सच्चा भक्त सन्तान वही है कि जो शरीर को अधिक से अधिक स्वस्थ रखने का ध्यान करता है। प्रभु ने परमार्थ-साधन के लिये यह शरीर दिया है, यदि इस शरीर को ही हम विकृत कर लेते हैं तो प्रभु के निर्देश का पालन न करते हुए हम उस प्रभु की अवज्ञा कर रहे होते हैं । [२] (पुत्रः) = पुत्र वही है (यत्) = जो (पित्रोः) = माता-पिता के (जानम्) = विकास को (अधीयति) = प्राप्त करता है। माता-पिता के गुण-कर्मों का अनुकरण करते हुए अपनी शक्तियों का विकास करनेवाला ही सच्चा पुत्र होता है । [३] (जाया) = पत्नी वह है जो (सुमत्) = उत्तम विचारपूर्वक उच्चारण की गई (वग्नुना) = वाणी से (पतिम्) = पति को (वहति) = आवश्यक पदार्थ प्राप्त कराती है। कभी कटु व अप्रीतिकर वचनों को नहीं बोलती । 'जाया पत्ये मधुमतीं वाचं वदतु शन्तिवाम्' = पत्नी पति के लिये माधुर्यवाली शान्ति को देनेवाली वाणी को बोले । [४] (पुंसः) = मानवजाति का (इत्) = निश्चय से (भद्रः) = भद्र पुरुष वही है जो इस बात का ध्यान करता है कि (वहतुः) = [Marriage ] उसका विवाह सम्बन्ध (परिष्कृतः) = बड़ा परिष्कृत हो, वासनात्मक यह सम्बन्ध न हो। पति-पत्नी का परस्पर प्रेम हो और वह प्रेम पुनीत सन्तान को जन्म देनेवाला हो। 'प्रजायै गृहमेधिनाम् ' सन्तान के लिये ही वे गृहस्थ में प्रविष्ट हुए हों और इस प्रकार गृहस्थाश्रम को वे यज्ञ का रूप दे दें।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम शरीर को उत्तम बनायें और प्रभु के सच्चे भक्त हों, माता-पिता से जीवन के विकास को सीखकर सच्चे पुत्र बनें, पत्नी के रूप में हों तो विचारपूर्वक मधुरवाणी से पति को प्राप्त हों। गृहस्थ को परिष्कृत बनाकर भद्र पुरुष बनें ।

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (पित्रोः पुत्रः-यत्-जानम्-अधि-इयति) मातापित्रोः पुत्रो यदा जन्माधिगच्छति धारयति (तत्-इत्-मे-वपुषः-वपुष्टरं छन्त्सत्) तदैव मम गृहस्थस्य सुन्दरस्य सुन्दरतरं सुखं परमात्मा कामयेत (वग्नुना जाया पतिं वहति) अतएव स्तुतिवाण्या भार्या पतिं प्राप्नोति (सुमत् पुंसः-इत्) पुरुषस्य सुहर्षकरं सुखं भवति (भद्रः-वहतुः परिष्कृतः) भजनीयः प्रापणीयो गृहस्थाश्रमस्य सुपरिणामः ॥३॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Let it be more and more pleasing for me as soul in body form then when man grows more and more handsome than beauty itself in existence, when the child born of parents carries the family line higher forward, when the wife pleases the husband and exhorts him with sweet words to love and noble thoughts, and it is nice and auspicious for the man to be good and cleansed at heart by love and loyalty.