'भक्त', 'पुत्र', 'जाया' व 'भद्र पुरुष' का लक्षण
पदार्थान्वयभाषाः - [१] प्रभु कहते हैं कि (तत्) = वह (इत्) = ही (मे) = मेरा है, वही मेरा सच्चा भक्त अपत्य है, जो कि (वपुषः वपुष्टरम्) = अच्छे से अच्छे शरीर की (छन्त्सत्) = कामना करता है। प्रभु का सच्चा भक्त सन्तान वही है कि जो शरीर को अधिक से अधिक स्वस्थ रखने का ध्यान करता है। प्रभु ने परमार्थ-साधन के लिये यह शरीर दिया है, यदि इस शरीर को ही हम विकृत कर लेते हैं तो प्रभु के निर्देश का पालन न करते हुए हम उस प्रभु की अवज्ञा कर रहे होते हैं । [२] (पुत्रः) = पुत्र वही है (यत्) = जो (पित्रोः) = माता-पिता के (जानम्) = विकास को (अधीयति) = प्राप्त करता है। माता-पिता के गुण-कर्मों का अनुकरण करते हुए अपनी शक्तियों का विकास करनेवाला ही सच्चा पुत्र होता है । [३] (जाया) = पत्नी वह है जो (सुमत्) = उत्तम विचारपूर्वक उच्चारण की गई (वग्नुना) = वाणी से (पतिम्) = पति को (वहति) = आवश्यक पदार्थ प्राप्त कराती है। कभी कटु व अप्रीतिकर वचनों को नहीं बोलती । 'जाया पत्ये मधुमतीं वाचं वदतु शन्तिवाम्' = पत्नी पति के लिये माधुर्यवाली शान्ति को देनेवाली वाणी को बोले । [४] (पुंसः) = मानवजाति का (इत्) = निश्चय से (भद्रः) = भद्र पुरुष वही है जो इस बात का ध्यान करता है कि (वहतुः) = [Marriage ] उसका विवाह सम्बन्ध (परिष्कृतः) = बड़ा परिष्कृत हो, वासनात्मक यह सम्बन्ध न हो। पति-पत्नी का परस्पर प्रेम हो और वह प्रेम पुनीत सन्तान को जन्म देनेवाला हो। 'प्रजायै गृहमेधिनाम् ' सन्तान के लिये ही वे गृहस्थ में प्रविष्ट हुए हों और इस प्रकार गृहस्थाश्रम को वे यज्ञ का रूप दे दें।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम शरीर को उत्तम बनायें और प्रभु के सच्चे भक्त हों, माता-पिता से जीवन के विकास को सीखकर सच्चे पुत्र बनें, पत्नी के रूप में हों तो विचारपूर्वक मधुरवाणी से पति को प्राप्त हों। गृहस्थ को परिष्कृत बनाकर भद्र पुरुष बनें ।