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अ॒स्येदे॒षा सु॑म॒तिः प॑प्रथा॒नाभ॑वत्पू॒र्व्या भूम॑ना॒ गौः । अ॒स्य सनी॑ळा॒ असु॑रस्य॒ योनौ॑ समा॒न आ भर॑णे॒ बिभ्र॑माणाः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

asyed eṣā sumatiḥ paprathānābhavat pūrvyā bhūmanā gauḥ | asya sanīḻā asurasya yonau samāna ā bharaṇe bibhramāṇāḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अ॒स्य । इत् । ए॒षा । सु॒ऽम॒तिः । प॒प्र॒था॒ना । अभ॑वत् । पू॒र्व्या । भूम॑ना । गौः । अ॒स्य । सऽनी॑ळाः । असु॑रस्य । योनौ॑ । स॒मा॒ने । आ । भर॑णे । बिभ्र॑माणाः ॥ १०.३१.६

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ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:31» मन्त्र:6 | अष्टक:7» अध्याय:7» वर्ग:28» मन्त्र:1 | मण्डल:10» अनुवाक:3» मन्त्र:6


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अस्य-इत्) इस परमात्मा की (एषा पूर्व्या सुमतिः-गौः) यह अच्छी स्तुतियोग्य शाश्वतिक-सदा से चली आई वाणी (पप्रथाना भूमना-अभवत्) विस्तार को प्राप्त होती हुई बहुत रूपवाली है (अस्य-असुरस्य) इन सबको प्राण देनेवाले परमात्मा के (समाने योनौ) समान आश्रय (भरणे) धरणीय स्वरूप में (बिभ्रमाणाः) अपने को समर्पित करते हुए (सनीळाः-आ) समानस्थानी होकर रहें ॥६॥
भावार्थभाषाः - प्राणस्वरूप परमात्मा की स्तुति शाश्वतिक वेदवाणी द्वारा विस्तृत होती है। तदनुसार स्तुति करनेवाले मोक्ष में समान आश्रय को प्राप्त होते हैं ॥६॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सुमति व भरण

पदार्थान्वयभाषाः - [१] गत मन्त्र में प्रतिपादित हुई (एषा) = यह (अस्य) = इस स्तोता की (सुमतिः) = कल्याणीमति (इत्) = निश्चय से (पप्रथाना) = निरन्तर विस्तृत होनेवाली हो। इस सुमति में कमी न आकर वृद्धि ही हो । [२] यह कल्याणीमति [क] (पूर्व्या) = पालन व पूरण करनेवालों में उत्तम हो । इस मति से शरीर रोगों से सुरक्षित रहे और मन में वासनाओं के कारण न्यूनता न आ जाये। यह सुमति [ख] (भूमना) = 'बहुत्वेन युक्त' हो, अर्थात् अपने परिवार को विस्तृत करनेवाली हो, वसुधा को ही अपना परिवार बनानेवाली हो। [ग] (गौः) = यह सुमति तत्त्वज्ञान को प्राप्त करानेवाली हो । तात्त्विक ज्ञान तो यही है कि हम सब उस प्रभु के पुत्र हैं और परस्पर भाई-भाई हैं, एक दूसरे के वर्धन में ही हमारी अभिवृद्धि है। [३] इस प्रकार एक परिवार के बनकर हम (अस्य असुरस्य) = इस प्राणशक्ति का सञ्चार करनेवाले [ असून् रातिं] प्रभु के (योनौ) = गृह में (सनीडः) = समान रूप से रहनेवाले हम हों, और इस समाने सबके लिये साधारण अथवा सबको सोत्साहित करनेवाले [सं आनयति] (आभरणे) = सब दृष्टिकोणों से पोषित करनेवाले घर में (विभ्रमाणा:) = सब शक्तियों का भरण व पोषण करनेवाले हम हों । प्रभु की शरण में रहते हुए हम 'शरीर, मन व मस्तिष्क' की शक्तियों से युक्त हों। उस प्रभु रूप गृह में निवास करते हुए हमारा पोषण ही पोषण हो। हम सभी को उस प्रभु के पुत्र रूप में जानें और मिलकर परस्पर वर्धन करनेवाले हों ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम सदा प्रभु रूप गृह में निवास करें, यह निवास हमारी शक्तियों का पोषण करे।

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अस्य इत् एषा सुमतिः पूर्व्या गौः पप्रथाना भूमना-अभवत्) अस्य परमात्मन एव हि खल्वेषा सुमतिः सुस्तुतियोग्या शाश्वतिकी वाक् विस्तारमाप्नुवाना बहुरूपा भवति (अस्य-असुरस्य) एतस्य सर्वेभ्यः प्राणप्रदस्य (समाने योनौ) समाने खल्वाश्रये (भरणे) धारणीये स्वरूपे (बिभ्रमाणाः) स्वात्मानं धरन्तः (सनीळाः-आ) समानस्थाना आतिष्ठेम ॥६॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - This knowledge and wisdom, this Vedic voice of this sage of divinity, may, we pray, be universal, eternal and ever expansive, and may we, united and organised together on this equal and undivided earth, abide under the same one social order of this mighty life-giving ruler, living safe, secure and sustained in a state of peace and progress.