पदार्थान्वयभाषाः - [१] (धीतिः) = ध्यान (अधायि) = धारण किया गया, अर्थात् प्रभु ध्यान को हमने जीवन का एक नैत्यिक कार्य बना लिया। [२] और (तीर्थे) = तीर्थों में, पात्रों में (अंशा:) = अंश (अससृग्रम्) = बनाये गये, अर्थात् हमने उपार्जित धन में से पात्रों में, योग्य व्यक्तियों में धनांश को प्राप्त कराया । यही धनों का यज्ञों में विनियोग है। [३] इस प्रकार करने पर (ऊमाः) = [ अवितारः ] पात्रों में दिये गये ये धनांश हमारे रक्षक होते हैं। ये रक्षक धनांश (दस्मम्) = विनाश को न उपयन्ति नहीं प्राप्त होते हैं, अर्थात् यह धनांशों का यज्ञों में विनियोग सदा चलता रहता है, इसमें कभी विच्छेद नहीं होता । [४] इसके परिणामरूप हम (सुवितस्य) = उत्तम आचरण के (शूषम्) = सुख को (अभ्यानश्म) = प्राप्त करनेवाले हों। यज्ञ की वृत्ति हमें दुष्टाचरण से बचाती है और परिणामतः दुःखों से छुड़ाती है । [५] सुवित के सुख को अनुभव करते हुए हम (अमृतानाम्) = नीरोगताओं के (नवेदसः) = [न वेत्तार:, वेत्तार एव] जाननेवाले अभूम हों। हम जीवन में सदा स्वस्थ हों ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हमारा जीवन प्रभु ध्यान से समवेत हो, हम पात्रों में धनों के देनेवाले हों, ये धनांशों के दान सतत चलते रहें, सदाचरण के सुख का हम अनुभव करें और पूर्ण नीरोग हों ।