पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (सिन्धवः) = शरीर में रुधिर के साथ सर्वत्र स्यन्दनशील रेतः कणो ! (तं ऊर्मिम्) = उस तरङ्ग को (प्रहेत) = हमें प्रकर्षेण प्राप्त कराओ जो (भत्सरम्) = [मादयितारं] जीवन के अन्दर उल्लास को उत्पन्न करनेवाली है, (इन्द्रपानम्) = जितेन्द्रिय पुरुष का रक्षण करनेवाली है। [२] उस ऊर्मि को प्राप्त कराओ (यः) = जो (उभे) = शरीर व मस्तिष्क दोनों को गतिमय बनाती है। जिसके कारण शरीर में गतिशीलता बनी रहती है और मस्तिष्क कहीं कुण्ठित नहीं होता। [३] उस ऊर्मि को प्राप्त कराओ जो कि 'मदच्युतं' शब्द की यह भावना भी सुन्दर है कि 'अभिमान को हमारे से दूर करनेवाली है'। (मदच्युतम्) = हमारे जीवनों में मद व हर्ष को टपकानेवाली है, (औशानम्) = उस प्रभु की प्राप्ति की कामना को हमारे में उत्पन्न करनेवाली है, (नभोजाम्) = मस्तिष्क रूप द्युलोक में प्रकाश के प्रादुर्भाव को करनेवाली है, (परि) = [ सर्वतः ] सब दृष्टिकोणों से (त्रितन्तुम्) = शरीर, मन व बुद्धि तीनों का विस्तार करनेवाली है, (विचरन्तम्) = विशेषरूप से जीवन को क्रियाशील बनानेवाली है, (उत्सम्) = उत्स्यन्दनं [=देवानां प्रति ऊर्ध्वं गन्तारं सा० ] हमें उत्कृष्ट गतिवाला करके दिव्य गुणों को प्राप्त करानेवाली है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - रेतः कणों का रक्षण हमें उन्नतवाला, सुन्दर शरीर व मस्तिष्कवाला निरभिमान प्रभु- प्रवण, क्रियाशील व ऊर्ध्व गतिवाला बनाता है।