पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (सिन्धवः) = स्यन्दनशील रेतःकणो ! (यः) = जो (वः) = आपका (गर्भ:) = गर्भरूपेण मध्य में रहनेवाला (मध्वः उत्सः) = माधुर्य का चश्मा है, उस (मधुमन्तं ऊर्मिम्) = मधुर उत्साह तरंग को (अस्मै) = इस जितेन्द्रिय पुरुष के लिये (प्रहिणोत) = प्रकर्षेण प्राप्त कराओ। आपके रक्षण से इसका जीवन माधुर्य का स्रोत ही बन जाए। उस माधुर्य में उत्साह तरंगति होता हो, अर्थात् आपका रक्षक स्फूर्ति - सम्पन्न माधुर्य को प्राप्त करे । [२] हे (आपः) = रेतः कणो! आप (रेवती:) = सब प्रकार की रयि से सम्पन्न हो । आप से उत्पन्न ऊर्मि उत्साह तरंग (घृतपृष्ठम्) = ज्ञान की दीप्ति व ईर्ष्यादि मानस मलों के क्षरण के पृष्ठ पर है और अतएव (ईड्यम्) = स्तुति के योग्य है। रेतः कणों से ज्ञान दीप्त होता है, मानस मल दूर होते हैं, जीवन को ये प्रशस्त बनाते हैं । [३] सो हे रेतःकणो! आप (अध्वरेषु) = इन जीवन के अहिंसात्मक यज्ञों में (मे) = मेरी (हवम्) = पुकार को (शृणुत) = सुनो, अर्थात् तुम मेरे अन्दर सुरक्षित रहते हुए मेरे जीवन में माधुर्य का संचार करो, मेरी ज्ञानदीप्ति व निर्मलता का आधार बनो, आपके रक्षण से मेरा जीवन सब आवश्यक रयि से सम्पन्न हो । यही मेरी प्रार्थना है। रेत: कणों के रक्षण से यह पूर्ण हो ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - रेतः कणों का रक्षण हमें उत्साह सम्पन्न ज्ञानी व निर्मल वृत्ति बनाता है ।