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प्रास्मै॑ हिनोत॒ मधु॑मन्तमू॒र्मिं गर्भो॒ यो व॑: सिन्धवो॒ मध्व॒ उत्स॑: । घृ॒तपृ॑ष्ठ॒मीड्य॑मध्व॒रेष्वापो॑ रेवतीः शृणु॒ता हवं॑ मे ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

prāsmai hinota madhumantam ūrmiṁ garbho yo vaḥ sindhavo madhva utsaḥ | ghṛtapṛṣṭham īḍyam adhvareṣv āpo revatīḥ śṛṇutā havam me ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

प्र । अ॒स्मै॒ । हि॒नो॒त॒ । मधु॑ऽमन्तम् । ऊ॒र्मिम् । गर्भः॑ । यः । वः॒ । सि॒न्ध॒वः॒ । मध्वः॑ । उत्सः॑ । घृ॒तऽपृ॑ष्ठम् । ईड्य॑म् । अ॒ध्व॒रेषु॑ । आपः॑ । रे॒व॒तीः॒ । शृ॒णु॒त । हव॑म् । मे॒ ॥ १०.३०.८

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ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:30» मन्त्र:8 | अष्टक:7» अध्याय:7» वर्ग:25» मन्त्र:3 | मण्डल:10» अनुवाक:3» मन्त्र:8


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सिन्धवः) हे राष्ट्र को बाँधनेवाली-थामनेवाली आधारभूत प्रजाओं ! (वः) तुम्हारा-तुम्हारे द्वारा दिया हुआ (यः-गर्भः-उत्सः) जो राजा द्वारा ग्राह्य भाग उत्कृष्ट है (मधुमन्तम्-ऊर्मिम्-अस्मै-प्रहिनोत) उस मधुर उल्लासरूप-प्रसन्नताकारक को इस राजा के लिये देओ (घृतपृष्ठम्-ईड्यम्) जो कि तेजस्वी प्रेरणा देनेवाला है, उसे देओ (अध्वरेषु रेवतीः आपः-मे हवं शृणुत) हे धन धान्यवाली प्रजाओं ! राजसूययज्ञप्रसङ्गों में मुझ पुरोहित के वचन को सुनो-स्वीकार करो ॥८॥
भावार्थभाषाः - प्रजाएँ राष्ट्र का आधार हैं, उनकी ओर से मर्यादा से दिया हुआ राजा के लिये उपहारभाग ग्रहण करने योग्य है, राष्ट्रकार्य में उत्साह व प्रेरणा का देनेवाला है, इसलिये अवश्य देना चाहिये ॥८॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

उत्साह, ज्ञान व निर्मलता

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (सिन्धवः) = स्यन्दनशील रेतःकणो ! (यः) = जो (वः) = आपका (गर्भ:) = गर्भरूपेण मध्य में रहनेवाला (मध्वः उत्सः) = माधुर्य का चश्मा है, उस (मधुमन्तं ऊर्मिम्) = मधुर उत्साह तरंग को (अस्मै) = इस जितेन्द्रिय पुरुष के लिये (प्रहिणोत) = प्रकर्षेण प्राप्त कराओ। आपके रक्षण से इसका जीवन माधुर्य का स्रोत ही बन जाए। उस माधुर्य में उत्साह तरंगति होता हो, अर्थात् आपका रक्षक स्फूर्ति - सम्पन्न माधुर्य को प्राप्त करे । [२] हे (आपः) = रेतः कणो! आप (रेवती:) = सब प्रकार की रयि से सम्पन्न हो । आप से उत्पन्न ऊर्मि उत्साह तरंग (घृतपृष्ठम्) = ज्ञान की दीप्ति व ईर्ष्यादि मानस मलों के क्षरण के पृष्ठ पर है और अतएव (ईड्यम्) = स्तुति के योग्य है। रेतः कणों से ज्ञान दीप्त होता है, मानस मल दूर होते हैं, जीवन को ये प्रशस्त बनाते हैं । [३] सो हे रेतःकणो! आप (अध्वरेषु) = इन जीवन के अहिंसात्मक यज्ञों में (मे) = मेरी (हवम्) = पुकार को (शृणुत) = सुनो, अर्थात् तुम मेरे अन्दर सुरक्षित रहते हुए मेरे जीवन में माधुर्य का संचार करो, मेरी ज्ञानदीप्ति व निर्मलता का आधार बनो, आपके रक्षण से मेरा जीवन सब आवश्यक रयि से सम्पन्न हो । यही मेरी प्रार्थना है। रेत: कणों के रक्षण से यह पूर्ण हो ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - रेतः कणों का रक्षण हमें उत्साह सम्पन्न ज्ञानी व निर्मल वृत्ति बनाता है ।

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सिन्धवः) हे राष्ट्रस्य बन्धयित्र्यस्तस्याधारभूताः प्रजाः “तद्यदेतैरिदं सर्वं सितं तस्मात् सिन्धवः” [जै० उ० १।९।२।९] (वः) युष्माकम् (यः-उत्सः-गर्भः) गर्भ इव ग्राह्यो राजग्राह्यो भागो मर्यादात उत्कृष्टोऽस्ति (मधुमन्तम्-ऊर्मिम्-अस्मै प्र हिनोत) तं मधुरमुल्लासरूपमस्मै राज्ञे प्रेरयत-प्रयच्छत (घृतपृष्ठम्-ईड्यम्) घृतम् तेजः पश्चाद्यस्य तथा च-अध्येषणीयं प्रदेयमेव तं प्रयच्छतेति सम्बन्धः (अध्वरेषु रेवतीः आपः मे हवं शृणुत) हे धनधान्यवत्यः प्रजाः ! राजसूययज्ञप्रसङ्गेषु मम पुरोहितस्य वचनं शृणुत-मन्यध्वम् ॥८॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O streams of life aflow, O dynamic people blest with wealth, honour and excellence, listen to my call and exhortation: Create and set in flow the sweetest honeyed waves of joy for this master power and ruler who is the fountain head and fathomless ocean source of your joy and fulfilment, refulgent and illustrious, adorable in the noblest yajnic meets of the world.