पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यद्) = जब (ईम्) = निश्चय से (उशती:) = हित की कामनावाले, अर्थात् सदा अपने रक्षक का हित करनेवाले इन [आप] रेतःकणों की (अच्छ) = ओर (उशन्) = चाहता हुआ युवक (एति) = प्राप्त होता है, तो (एवा इत्) = ऐसा होने पर ही (यूने) = उस युवक के लिये (युवतयः) = युवतियाँ (नमन्त) = आदरवाली होती हैं। रेतःकणों के रक्षण से युवक का शरीर इतना सुन्दर प्रतीत होता है कि सब युवतियाँ उसकी ओर आकृष्ट होती हैं, उसके सौन्दर्य की प्रशंसा करती हैं, उनमें उसके प्रति आदर का भाव होता है । [२] (च) = और ये (देवी:) = सब रोगों के जीतने की कामनावाले (आपः) = रेतः कण (संजानते) = संज्ञानवाले होते हैं। अपने रक्षक में उत्तम ज्ञान को पैदा करनेवाले होते हैं और (मनसा) = मन के दृष्टिकोण से (संचिकित्रे) = इसकी उत्तम चिकित्सा करते हैं, अर्थात् इसके मन में किसी प्रकार के विकार को नहीं रहने देते एवं रेतःकणों के रक्षण से जहाँ बुद्धि में दीप्ति आकर ज्ञानवृद्धि होती है वहाँ मन में पवित्रता का संचार होता है। [३] इस प्रकार ये दिव्यगुणोंवाले रेतः कण (अध्वर्यवः) = अपने रक्षक के साथ अ+ध्वर+यु' = अहिंसा को जोड़नेवाले हैं और (धिषणा) = ये बुद्धि ही बुद्धि हैं, अर्थात् इनका रक्षण बुद्धि को तीव्र बनानेवाला है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - रेतः कणों का रक्षण शरीर के स्वास्थ्य के साथ मन व बुद्धि के स्वास्थ्य को देनेवाला है।