पदार्थान्वयभाषाः - [१] (अध्वर्यवः) = [अध्वर्यु] अपने साथ अहिंसा के सम्पृक्त करनेवालो ! (अपः) = रेतः कणों के प्रति (इता) = जाओ, अर्थात् शरीर में इन रेतः कणों को सुरक्षित करनेवाले बनो । [२] रेतःकणों के रक्षण के लिये उस प्रभु के साथ (हविषा) = हवि के द्वारा, दानपूर्वक अदन के द्वारा (यजध्वम्) = अपना सम्पर्क बनाओ, जो प्रभु (समुद्रम्) = सदा मोद व हर्ष के साथ निवास करनेवाले हैं तथा (अपां नपातम्) = इन रेतःकणों का पतन न होने देनेवाले हैं । [३] (स) = वे प्रभु (वः) = तुम्हें (अद्या) = आज (सुपूतम्) = अत्यन्त पवित्रता के साधनभूत (ऊर्मिम्) = सोम-संघात को (ददत्) = दें । प्रभु कृपा से ही यह (सोमम्) = वीर्य प्राप्त होता है और यह हमारे जीवन को पवित्र बनाता है । [४] (तस्मै) = उस प्रभु की प्राप्ति के लिये (मधुमन्तम्) = अत्यन्त माधुर्यवाले इस सोम का (सुनोत) = उत्पादन करो । उत्तम आहार के सेवन से शरीर में सोम की उत्पत्ति होती है, यह सोम हमारे जीवन को मधुर बनाता है और शरीर में सुरक्षित होकर, ज्ञानाग्नि को दीप्त करता हुआ, हमें प्रभु-दर्शन के योग्य बनाता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु की उपासना से, वासनाओं से बचने के द्वारा सोमरक्षण होता है और सोमरक्षण से बुद्धि सूक्ष्म होकर प्रभु दर्शन का साधन बनती है ।