पदार्थान्वयभाषाः - [१] उस प्रभु की प्राप्ति के लिये (अध्वर्यवः) = [अ+ध्वर्+यु] अपने साथ हिंसा को न जोड़नेवाले और (हि) = निश्चय से (हविष्मन्तः) = हविवाले (भूत) = होइये । प्रभु की प्राप्ति के मार्ग पर चलनेवाला व्यक्ति हिंसा की वृत्ति से ऊपर उठता है और वह सदा दानपूर्वक अदन करनेवाला होता है । [२] (उशती) = हित को चाहनेवाले (अपः) = रेतः कणों की (अच्छा) = ओर (उशन्तः) = प्रबल इच्छावाले होते हुए (इत) = आओ, अर्थात् तुम्हारे अन्दर इन रेतः कणों के रक्षण की प्रबल भावना हो । इन रेतः कणों ने ही तो तुम्हारा रक्षण करना है । [३] ये सोमकण [अप] वे हैं (या:) = जिनको (सुपर्णः) = अपना उत्तमता से पालन व पूरण करनेवाला (अरुण:) = तेजस्वी पुरुष (अवचष्टे) = [To observe] बड़े ध्यान से देखता है, अर्थात् इनके रक्षण का पूर्ण प्रयत्न करता है । [४] हे (सुहस्ता:) = उत्तम हाथोंवाले, कार्यों को कुशलता से करनेवाले अथवा [ हन् हिंसागत्योः = हस्त] उत्तमता से वासनाओं का हनन करनेवाले पुरुषो! (अद्या) = आज ही (तम्) = उस (ऊर्मिम्) = सोम संघात को, वीर्यकण समूह को (आस्यध्वम्) = अधिष्ठित करो, अर्थात् उनके शरीर में ही रक्षण के लिये यत्नशील होवो ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु प्राप्ति के लिये हम - [क] हिंसा से ऊपर उठें, [ख] यज्ञशेष का सेवन करें और [ग] सोम का रक्षण करनेवाले बनें ।