पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (आपः) = रेतः कणो ! (यद्) = जब मैं आपको (आयती:) = शरीर में सर्वत्र गति करते हुए, अर्थात् शरीर में रुधिर के साथ व्याप्त होते हुए (प्रति अदृश्रम्) = प्रतिदिन देखता हूँ, अर्थात् जब आपका अपव्यय न होकर शरीर में ही रक्षण होता है तो मैं देखता हूँ कि आप (घृतम्) = ज्ञानदीप्ति व मलों के क्षरण को बुद्धि की तीव्रता व मानस निर्मलता को, (पयांसि) = सब प्रकार के आप्यायन को, शरीर की शक्तियों के वर्धन को तथा (मधूनि) = मधुर वचनों व व्यवहारों को (बिभ्रतीः) = धारण करते हुए हो । वीर्यरक्षण से जहाँ [क] हमारी बुद्धि बढ़ती है, वहाँ [ख] मन निर्मल होता है, [ग] हमारे शरीर की सब शक्तियों का आप्यायन होता है और [घ] हमारे जीवन में माधुर्य की वृद्धि होती है । [२] हे रेतःकणो! आप (अध्वर्युभिः) = अध्वर-हिंसारहित यज्ञों को अपने साथ जोड़नेवाले पुरुषों के साथ (मनसा संविदाना:) = मन से संज्ञानवाले होवो । अध्वर्युओं के साथ आपका मेल हो । दूसरे शब्दों में जो भी व्यक्ति अध्वर्यु बनता है उसके साथ आपका मेल होता है । यज्ञादि उत्तम कर्मों में लगा हुआ पुरुष इनका रक्षण करनेवाला बनता है। ये (आपः) = रेतः कण (इन्द्राय) = जितेन्द्रिय पुरुष के लिये (सुषुतं सोमम्) = इस उत्तमता से उत्पादित सोम को (भरन्तीः) = पुष्ट करनेवाले होते हैं। सोम शक्ति सम्पन्न बनकर यह व्यक्ति सोम्य व शान्त स्वभाव का होता है । [३] यहाँ मन्त्र के पूर्वार्ध में रेतःकणों के रक्षण के लाभों का देना है। 'घृतं पयांसि, मधूनि ' ये शब्द उन लाभों का वर्णन इस रूप में कर रहे हैं कि ज्ञान दीप्त होगा, मन निर्मल होगा, शरीर की शक्तियों का आप्यायन होगा तथा वचन व व्यवहार में मिठास आ जायेगी। उत्तरार्ध में रेतः कणों के रक्षण के उपाय 'अध्वर्युभिः ' तथा 'इन्द्राय' शब्दों से सूचित किये गये हैं। 'यज्ञादि उत्तम कर्मों में लगे रहना' यह रेतः रक्षण के लिये आवश्यक है। दूसरा उपाय जितेन्द्रियता है, अजितेन्द्रिय के लिये वीर्यरक्षण का सम्भव नहीं। 'खाली न रहें, जितेन्द्रिय बनने का प्रयत्न करें' यही रास्ता है जिस पर कि चलकर हम वीर्यरक्षण कर पाते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- वीर्यरक्षण के लाभ हैं-ज्ञानदीप्ति, मानस नैर्मल्य, शक्तियों का आप्यान व माधुर्य । वीर्यरक्षण का उपाय है-यज्ञादि उत्तम कर्मों में लगे रहना और जितेन्द्रिय बनने का प्रयत्न करना ।