पदार्थान्वयभाषाः - [१] गत मन्त्र के अनुसार (मधुः) = सोम वीर्य से शरीर को सिक्त करनेवाला (स्वोजा:) = उत्तम ओजवाला (इन्द्रः) = जितेन्द्रिय पुरुष (पृतनाः) = शत्रु- सैन्यों को (व्यानट्) = विशेषरूप से घेरनेवाला, उन्हें पराभूत करनेवाला बनता है। [२] इस प्रकार काम-क्रोधादि शत्रुओं को पराभूत करनेवाले (पूर्वी:) = अपना पूरण करनेवाले लोग (अस्मै सख्याय) = इस प्रभु की मित्रता के लिये (आयतन्ते) = सर्वथा प्रयत्न करते हैं। [३] प्रभु की मित्रता को प्राप्त करके प्रभु से यही चाहते हैं कि (न) = जैसे (पृतनासु) = संग्रामों में (रथम्) = रथ पर सारथि स्थित होता है उसी प्रकार हे प्रभो ! आप भी (स्म) = निश्चय से (रथम्) = हमारे इस शरीर - रथ पर (आतिष्ठ) = आरूढ़ होइये । उस रथ पर (यम्) = जिसको कि (भद्रया सुमत्या) = कल्याणी सुमति से (चोदयासे) = प्रेरित करते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु मेरे रथ के सारथि हों, मैं अपनी जीवनयात्रा की दिशा प्रभु के निर्देश से चुनूँ । सूक्त का प्रारम्भ इन शब्दों से होता है कि मैं संयत भोजनवाला बनूँ। [१] सस्यभोजी होऊँ, [२] प्रभु मेरी वाणियों व इन्द्रिय द्वारों को शुद्ध कर दें, [३] प्रभु जैसा बनकर मैं प्रभु को पाऊँ, [४] प्रभु कृपा से भवसागर के पार हो जाऊँ, [५] निर्माता के लिये संसार में न्यूनता नहीं, [६] क्रतु और पौंस्य को सिद्ध कर मैं भी पूर्ण बनूँ, [७] प्रभु मेरे रथ के सारथि हों और मेरी यात्रा सुन्दरता से पूर्ण हो ।