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व्या॑न॒ळिन्द्र॒: पृत॑ना॒: स्वोजा॒ आस्मै॑ यतन्ते स॒ख्याय॑ पू॒र्वीः । आ स्मा॒ रथं॒ न पृत॑नासु तिष्ठ॒ यं भ॒द्रया॑ सुम॒त्या चो॒दया॑से ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

vy ānaḻ indraḥ pṛtanāḥ svojā āsmai yatante sakhyāya pūrvīḥ | ā smā rathaṁ na pṛtanāsu tiṣṭha yam bhadrayā sumatyā codayāse ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

वि । आ॒न॒ट् । इन्द्रः॑ । पृत॑नाः । सु॒ऽओजाः॑ । आ । अ॒स्मै॒ । य॒त॒न्ते॒ । स॒ख्याय॑ । पू॒र्वीः । आ । स्म॒ । रथ॑म् । न । पृत॑नासु । ति॒ष्ठ॒ । यम् । भ॒द्रया॑ । सु॒ऽम॒त्या । चो॒दया॑से ॥ १०.२९.८

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ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:29» मन्त्र:8 | अष्टक:7» अध्याय:7» वर्ग:23» मन्त्र:3 | मण्डल:10» अनुवाक:2» मन्त्र:8


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (स्वोजाः-इन्द्रः) सुन्दर तेजवाला ऐश्वर्यवान् परमात्मा (पृतनाः-व्यानट्) मनुष्यों को-मनुष्यों के अन्तःकरणों में व्याप्त है (पूर्वीः-अस्य सख्याय आ यतन्ते) श्रेष्ठ प्रजाएँ-उपासक जन इस परमात्मा के मित्रभाव के लिये भली-भाँति चाहना करते हैं (पृतनासु रथं न स्म-आ तिष्ठ) मनुष्यों के स्वकीय रमणयोग्य आनन्द को तत्काल भली-भाँति स्थापित कर (यं भद्रया सुमत्या चोदयासे) जिस रमणयोग्य आनन्द को भजनीय स्तुति द्वारा-भजनीय स्तुति को लक्ष्य करके मनुष्यों के अन्दर तू प्रेरित करता है ॥८॥
भावार्थभाषाः - ओजस्वी तथा ऐश्वर्यवान् परमात्मा मनुष्यों के अन्तःकरणों में व्याप्त रहता है। उपासक जन मित्रभाव के लिए उसे अपनाना चाहते हैं। उनके अन्दर परमात्मा अपने आनन्दरस को स्तुतियों द्वारा प्रेरित किया करता है ॥८॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

रथी व सारथि

पदार्थान्वयभाषाः - [१] गत मन्त्र के अनुसार (मधुः) = सोम वीर्य से शरीर को सिक्त करनेवाला (स्वोजा:) = उत्तम ओजवाला (इन्द्रः) = जितेन्द्रिय पुरुष (पृतनाः) = शत्रु- सैन्यों को (व्यानट्) = विशेषरूप से घेरनेवाला, उन्हें पराभूत करनेवाला बनता है। [२] इस प्रकार काम-क्रोधादि शत्रुओं को पराभूत करनेवाले (पूर्वी:) = अपना पूरण करनेवाले लोग (अस्मै सख्याय) = इस प्रभु की मित्रता के लिये (आयतन्ते) = सर्वथा प्रयत्न करते हैं। [३] प्रभु की मित्रता को प्राप्त करके प्रभु से यही चाहते हैं कि (न) = जैसे (पृतनासु) = संग्रामों में (रथम्) = रथ पर सारथि स्थित होता है उसी प्रकार हे प्रभो ! आप भी (स्म) = निश्चय से (रथम्) = हमारे इस शरीर - रथ पर (आतिष्ठ) = आरूढ़ होइये । उस रथ पर (यम्) = जिसको कि (भद्रया सुमत्या) = कल्याणी सुमति से (चोदयासे) = प्रेरित करते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु मेरे रथ के सारथि हों, मैं अपनी जीवनयात्रा की दिशा प्रभु के निर्देश से चुनूँ । सूक्त का प्रारम्भ इन शब्दों से होता है कि मैं संयत भोजनवाला बनूँ। [१] सस्यभोजी होऊँ, [२] प्रभु मेरी वाणियों व इन्द्रिय द्वारों को शुद्ध कर दें, [३] प्रभु जैसा बनकर मैं प्रभु को पाऊँ, [४] प्रभु कृपा से भवसागर के पार हो जाऊँ, [५] निर्माता के लिये संसार में न्यूनता नहीं, [६] क्रतु और पौंस्य को सिद्ध कर मैं भी पूर्ण बनूँ, [७] प्रभु मेरे रथ के सारथि हों और मेरी यात्रा सुन्दरता से पूर्ण हो ।

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (स्वोजाः-इन्द्र) शोभनतेजस्वी तथैश्वर्यवान् परमात्मा (पृतनाः-व्यानट्) मनुष्यान् “पृतनाः-मनुष्याः” [निघं० २।३] व्याप्नोति तदन्तःकरणेषु (पूर्वीः अस्य सख्याय-आयतन्ते) श्रेष्ठप्रजाः-उपासकजना अस्मै-अस्य खल्विन्द्रस्य परमात्मनः-व्यत्ययेन षष्ठीस्थाने चतुर्थी, सखिभावाय सहयोगाय समन्ताद् यतन्ते काङ्क्षन्ति अथ प्रत्यक्षदृष्ट्योच्यते (पृतनासु रथं न स्म-आतिष्ठ) मनुष्येषु स्वकीयरमणयोग्यमानन्दं सम्प्रति “नकारः सम्प्रत्यर्थे” आस्थापय ‘इत्यन्तर्गतणिजर्थः’ (यं भद्रया सुमत्या चोदयासे) यं रमणयोग्यमानन्दं भजनीयया स्तुत्या-भजनीयां स्तुतिं लक्ष्यीकृत्य मनुष्येषु प्रेरयसि ॥८॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra, lord of holy light and lustre, pervades the peoples’ heart and soul within and joins them in their struggles in the world outside. The best of people since time immemorial try to win his love and friendship with homage, prayer and meditation. O lord of cosmic chariot, ruler of the world, come to us to bless us and our social order like a master of the chariot among people whom you inspire and bless with clear intelligence, noble ambition and holy enthusiasm in the right direction.