पदार्थान्वयभाषाः - [१] (अस्मा इन्द्राय) = इस प्रभु की प्राप्ति के लिये इस (पूर्णं अमत्रम्) = सब प्रकार की कमियों से रहित शरीररूप पात्र को (मध्वः) = मुझ से, सोम से (असिचन्) = सिक्त करते हैं। शरीर ' अमत्र' है, [अम गतौ, त्रा- पालने] गति के द्वारा इसका पालन होता है। यह शरीर पूर्ण है, उन्नति के लिये सब आवश्यक साधन इसमें जुटाये हुए हैं इसमें प्रभु ने आहार से रसादि के क्रम से वीर्य की उत्पत्ति की व्यवस्था की है। यह वीर्य यहाँ 'मधु' कहा गया है, यह सुरक्षित होकर जीवन को मधुर बनाता है । इसका शरीर में ही सेचन होने पर शरीर नीरोग बनता है और बुद्धि तीव्र होती है और इस प्रकार स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मन वाले बनकर हम प्रभु दर्शन के योग्य होते हैं । [२] इस प्रकार शरीररूप पात्र को मधु से सिक्त करनेवाला (सः) = वह (हि) = निश्चय से (सत्यराधाः) = सत्य को सिद्ध करनेवाला अथवा सत्य सम्पत्तिवाला होता है । (स) = वह (पृथिव्याः) = पृथिवी के (वरिमन्) = विस्तृत प्रदेश में (आवावृधे) = सब प्रकार से बढ़ता है । [३] यह (अभि) = दोनों ओर, अन्दर और बाहर, अन्दर तो (क्रत्वा) = प्रज्ञान से (च) = और बाहर (पौंस्यैः) = वीरता पूर्ण कर्मों से बढ़ा हुआ यह (नर्यः) = सदा नरहित करनेवाला होता है। अपने में ज्ञान और शक्ति का समन्वय करके यह लोकहित के कार्यों में व्यस्त रहता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम शरीर को सोम से सिक्त करें वीर्यरक्षण द्वारा इसे पुष्ट बनायें। ज्ञान व शक्ति सम्पन्न होकर लोकहित के कार्यों में प्रवृत्त रहें ।