पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे प्रभो! (ते) = आपकी (अस्याः उषसः) = इस उषाकाल के तथा (अपरस्याः) = आनेवाली भी उषा के (प्रनृतौ) = प्रकृष्ट भवन में (प्रस्याम) = प्रकर्षेण हों। आप प्रत्येक उषःकाल में जिधर भी हमें ले चलनेवाले हों, उधर ही हम चलें। आप जो नाच नचायें, वही हमें रुचिकर हो । आप (नृणां नृतमस्य) = मनुष्यों के सर्वोत्तम नेता हैं। आपका नेतृत्व ही हमारा संचालक हो । [२] (अनु) = ऐसा होने पर ही, इसके बाद ही (कुत्सेन) = [कुथ हिंसायाम्] सब बुराइयों के संहार से (त्रिशोकः) = 'शरीर, मन व बुद्धि' तीनों की दीप्ति (नॄन्) = मनुष्यों को (शतं आवहत्) = सौ वर्ष तक ले चलनेवाली होती है । जब हम प्रभु की इच्छा के अनुसार जीवन को चलाते हैं, तो तीनों दीप्तियों को प्राप्त करते हैं और ये तीनों दीप्तियाँ हमारे जीवनों को सौ वर्ष तक ले चलने का कारण बनती हैं। [३] (यः रथः) = [रथः अस्य अस्ति इति रथः ] इस प्रकार जो भी उत्तम शरीररूप रथवाला व्यक्ति (असत्) = होता है वह (ससवान्) = सस्य को ही खानेवाला होता है, यह वानस्पतिक भोजन को ही करता है। वानस्पतिक भोजन सात्त्विक है, यही उपादेय है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु की आज्ञा में चलें । सस्यभोजी बनें। इस प्रकार शरीर, मन व बुद्धि को दीप्त करनेवाले 'त्रिशोक' बनें।