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प्र ते॑ अ॒स्या उ॒षस॒: प्राप॑रस्या नृ॒तौ स्या॑म॒ नृत॑मस्य नृ॒णाम् । अनु॑ त्रि॒शोक॑: श॒तमाव॑ह॒न्नॄन्कुत्से॑न॒ रथो॒ यो अस॑त्सस॒वान् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

pra te asyā uṣasaḥ prāparasyā nṛtau syāma nṛtamasya nṛṇām | anu triśokaḥ śatam āvahan nṝn kutsena ratho yo asat sasavān ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

प्र । ते॒ । अ॒स्याः । उ॒षसः॑ । प्र । अप॑रस्याः । नृ॒तौ । स्या॒म॒ । नृऽत॑मस्य । नृ॒णाम् । अनु॑ । त्रि॒ऽशोकः॑ । श॒तम् । आ । अ॒व॒ह॒न् । नॄन् । कुत्से॑न । रथः॑ । यः । अस॑त् । स॒स॒ऽवान् ॥ १०.२९.२

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ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:29» मन्त्र:2 | अष्टक:7» अध्याय:7» वर्ग:22» मन्त्र:2 | मण्डल:10» अनुवाक:2» मन्त्र:2


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (नृणां नृतमस्य ते अस्याः-उषसः) हे ऐश्वर्यवन् परमात्मन् ! नायकों के भी अत्यन्त तुझ नायक की इस ज्ञानदीप्ति की (नृतौ प्र स्याम) नीति में हम प्रगतिशील हों (अपरस्याः प्र) आगामी दिन कल भी उस ज्ञानदीप्ति की नीति में हम प्रगतिशील हों (त्रिशोकः) तीनों-स्तुति प्रार्थना उपासनाओं में या ज्ञानकर्म-उपासनारूप त्रयी विद्या में वर्तमान ज्ञानप्रकाश जिसका है, वह ऐसा महाविद्वान् (शतं नॄन्-अनु आवहत्) बहुतेरे नायक जनों को तेरे ज्ञान वेद को प्राप्त करके अपने को उसके अनुकूल चलाता है (यः-कुत्सेन ससवान्) जो तेरा स्तुति करनेवाला ज्ञान का सम्भाजक-पूर्णज्ञानी है (रथः-असत्) वह सबका रमण आश्रय होता है ॥२॥
भावार्थभाषाः - महान् नेता परमात्मा की ज्ञानज्योति वेद सदा मार्गदर्शक है। उसमें वर्णित स्तुति, प्रार्थना, उपासना या ज्ञान, कर्म, उपासना में दीप्ति हुआ-प्रकाशमान हुआ परमात्मा का उपासक ज्ञान का धारण करनेवाला सबको ज्ञान देनेवाला आश्रय करने के योग्य है ॥२॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

ससवान्

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे प्रभो! (ते) = आपकी (अस्याः उषसः) = इस उषाकाल के तथा (अपरस्याः) = आनेवाली भी उषा के (प्रनृतौ) = प्रकृष्ट भवन में (प्रस्याम) = प्रकर्षेण हों। आप प्रत्येक उषःकाल में जिधर भी हमें ले चलनेवाले हों, उधर ही हम चलें। आप जो नाच नचायें, वही हमें रुचिकर हो । आप (नृणां नृतमस्य) = मनुष्यों के सर्वोत्तम नेता हैं। आपका नेतृत्व ही हमारा संचालक हो । [२] (अनु) = ऐसा होने पर ही, इसके बाद ही (कुत्सेन) = [कुथ हिंसायाम्] सब बुराइयों के संहार से (त्रिशोकः) = 'शरीर, मन व बुद्धि' तीनों की दीप्ति (नॄन्) = मनुष्यों को (शतं आवहत्) = सौ वर्ष तक ले चलनेवाली होती है । जब हम प्रभु की इच्छा के अनुसार जीवन को चलाते हैं, तो तीनों दीप्तियों को प्राप्त करते हैं और ये तीनों दीप्तियाँ हमारे जीवनों को सौ वर्ष तक ले चलने का कारण बनती हैं। [३] (यः रथः) = [रथः अस्य अस्ति इति रथः ] इस प्रकार जो भी उत्तम शरीररूप रथवाला व्यक्ति (असत्) = होता है वह (ससवान्) = सस्य को ही खानेवाला होता है, यह वानस्पतिक भोजन को ही करता है। वानस्पतिक भोजन सात्त्विक है, यही उपादेय है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु की आज्ञा में चलें । सस्यभोजी बनें। इस प्रकार शरीर, मन व बुद्धि को दीप्त करनेवाले 'त्रिशोक' बनें।

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (नृणां नृतमस्य ते अस्याः-उषसः) हे ऐश्वर्यवन् परमात्मन् ! नायकानामप्यत्यन्तनायकस्य तवास्याः खलूषसो वेदज्ञानदीप्तेः सम्प्रति प्राप्तायाः (नृतौ प्र स्याम) नयने नीत्यां प्रगतिशीलाः स्याम (अपरस्याः प्र) आगामिनि दिने श्वोऽपि वेदज्ञानदीप्तेर्नयने मार्गे प्रगतिशीला भवेम (त्रिशोकः) तिसृषु स्तुतिप्रार्थनोपासनासु यद्वा तिसृषु विद्यासु वर्त्तमानो ज्ञानप्रकाशो यस्य तथाभूतो महाविद्वान् “शोचति ज्वलतिकर्मा” [निघ० १।१६] (शतं नॄन् अनु आवहत्) बहून् नायकान् जनान् तव ज्ञानं वेदमवाप्य स्वमनु वहति पश्चाच्चालयति शिष्यान् सम्पादयति (यः कुत्सेन ससवान्) यो हि तव कुत्सः स्तुतिकर्त्ता “कुत्सः कर्त्ता स्तुतीनाम्” [निरु० ३।१२] ज्ञानस्य सम्भाजकः “ससवान् सम्भाजकः” [ऋ० ३।२२।१ दयानन्दः] (रथः असत्) सर्वेषां रमणाश्रयो भवति ॥२॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra, ruler of the world, manliest leader of the leaders of humanity, lord of triple splendour of knowledge, action and spiritual advancement, who command a hundred heroes by virtue of power and thunder, source of peace, advancement and bliss, may we ever abide in the light and joy of the dawn of today and of other days to come in our course of life.