पदार्थान्वयभाषाः - [१] प्रभु कहते हैं कि (नु) = निश्चय से ही (अत्र) = यहाँ इस मानव जीवन में मैं (दर्शम्) = देखता हूँ । उन लोगों को जो (शृतपान्) = भट्ठियों में पकायी गयी शराब को पीनेवाले हैं [शृ पाके], (अनिन्द्रान्) = जो सर्वशक्तिमान् परमैश्वर्यशाली प्रभु के स्मरण से रहित हैं, (बाहुक्षदः) = अपनी भुजशक्ति से भले लोगों को टुकड़े-टुकड़े करने में लगे हुए हैं, (शरवे) = हिंसा के लिये (पत्यमानान्) = जो गति कर रहे हैं, जिनकी क्रियाएँ औरों के ध्वंस के लिये ही होती हैं। (वा) = या (ये) = जो (घृषुम्) = शत्रुओं का संहार करनेवाले (सखायम्) = मित्रभूत मुझे (निनिदुः) = निन्दित करते हैं, उपासना के स्थान में जो मेरा निरादर करते हैं । [२] इस प्रकार के (एषु अधि) = इन लोगों के ऊपर (पवय:) = मेरे वज्ररूप (अस्त्र ववृत्युः) = पड़ते हैं। इनका उन वज्रों व अशनिपातों से संहार हो जाता है, यहाँ 'वज्रपतन' प्रतीक है आधिदैविक आपत्तियों का । इन पर आधिदैविक आपत्तियाँ आती हैं और आधिदैविक आपत्तियाँ आकर इनका अन्त कर देती हैं। [३] यहाँ नाशक्रम इस प्रकार संकलित हो रहा है- [क] शराब पीने लगना, [ख] प्रभु को भूल जाना, [ग] अपनी शक्ति का प्रयोग सज्जनों के पीड़ित करने में करना और [घ] हिंसा प्रधान गतिवाला होना। [ङ] अन्ततः प्रभु की निन्दा करने लगना ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - शराब मनुष्य को प्रभु से दूर ले जाती है और हिंसक वृत्ति का बना देती है ।