पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (सोम) = शान्त परमात्मन् ! आप (नः) = हमारे (पशुम्) = काम-क्रोधरूप पाशविक भाव को (रक्षसि) = उसी प्रकार कैद में, संयम में रखते हैं जैसे कि शेर को पिञ्जरे में रखा जाता है । [२] इस प्रकार 'कामः पशु, क्रोधः पशुः ' काम-क्रोधरूप इन पशुओं को पूर्णरूप से वश में रखते हुए आप (पुरुत्रा) = नाना प्रकार की कामनाओं में (विष्ठितम्) = विशेषरूप से स्थित, अर्थात् इस काम मय जगत् में विविध कामनाओं में विचरनेवाले (जगत्) = इन लोगों को (जीवसे) = उत्तम जीवन के लिये (समाकृणोषि) = करते हैं। कामशून्य जीवन तो कोई जीवन ही नहीं, वह तो अचेतनावस्था है। पर काममय जीवन भी कोई सुन्दर जीवन नहीं, वह जीवन पतनोन्मुख होता है । 'कामातता न प्रशस्ता न चैषेहासयकामता 'मनु कहते हैं कि काममयता तो ठीक है ही नहीं, पर अकामता भी तो प्रशस्त नहीं। प्रभु हमारे काम-क्रोध को संयत करके हमारे जीवन को सुन्दर बना देते हैं । [३] हे प्रभो ! इस प्रकार आप ही (विश्वा भुवना संपश्यन्) = सम्पूर्ण लोकों का ध्यान कर रहे हैं [Look after ]। (वः) = आपकी प्राप्ति के (विमदे) = विशिष्ट आनन्द में ही लोग (विवक्षते) = विशिष्ट उन्नति के लिये होते हैं । वास्तविक उन्नति तभी प्रारम्भ होती है जब कि जीव प्रभु प्राप्ति के लिए प्रभु की उपासना में आनन्द लेने लगता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु कृपा से हमारे काम-क्रोध संयत हों और इस प्रकार हमारा जीवन उत्तम बने । प्रभु ही हमारा पालन करनेवाले हैं, हम उनकी उपासना में चलते हुए निरन्तर उन्नत हों ।