परमात्म प्राप्ति व क्रतु-धारण
पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (सोम) = शान्त प्रभो ! अब तो मेरी (धीतयः) = ध्यान वृत्तियाँ व स्तुतियाँ (उ) = निश्चय से (सं प्रयन्ति) = आपकी ओर ही आती हैं, उस प्रकार स्वभाविक रूप से तथा प्रबलता से आती हैं (इव) = जिस प्रकार (सर्गासः) = खूटों से खोली गई गौवें [विसृज्यन्ते उदक पानार्थम् सा० ] (अवतान्) = कूओं की ओर आती हैं। प्यास की प्रबलता के कारण उन्हें कूएँ की ओर जाने के सिवाय कुछ रुचता ही नहीं इसी प्रकार मेरी ध्यानवृत्तियाँ भी अब आपकी ओर ही लगी हैं, वे इधर-उधर नहीं जाती । [२] (वः) = आपकी प्राप्ति के (विमदे) = विशिष्ट आनन्द के निमित्त तथा जीवसे उत्कृष्ट जीवन के लिए (नः) = हमारे में (क्रतुं धारया) = क्रतु का धारण कीजिए हमारे मस्तिष्क में प्रज्ञा का स्थापन हो [क्रतु- प्रज्ञा], हृदय में संकल्प हो [ क्रतु-संकल्प] तथा हमारे हाथ यज्ञादि उत्तम कर्मों में व्यापृत हों [क्रतु-यज्ञ] । हमारे में क्रतु का धारण इस प्रकार कीजिए (इव) = जिस प्रकार कि अन्तरिक्ष में (चमसान्) = [चमस= मेघ नि० १ । १०] आप मेघों की स्थापना करते हैं । बाह्य अन्तरिक्ष में जो मेघ का स्थान है, मेरे हृदयान्तरिक्ष में वही क्रतु का स्थान हो । मेघ अन्न को उत्पन्न करता है, सन्ताप को दूर करता है। इसी प्रकार मेरा संकल्प भी यज्ञादि को उत्पन्न करे तथा लोक-सन्ताप को हरनेवाला हो । [३] यह सब आप विवक्षसे मेरी विशिष्ट उन्नति के लिये करिये ही । उन्नति का यही मार्ग है । 'क्रतु' ही उन्नति का साधक है, सो आप इसे मेरे में स्थापित करिये। क्रतु शून्य हृदय तो वेग से शून्य घोड़े व दूध से रहित गौ के समान ही तो है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - मेरी ध्यान-वृत्तियाँ प्रभु-प्रवण हों । प्रभु कृपा से मेरा हृदय क्रतु सम्पन्न हो ।