वांछित मन्त्र चुनें

हरी॒ न्व॑स्य॒ या वने॑ वि॒दे वस्विन्द्रो॑ म॒घैर्म॒घवा॑ वृत्र॒हा भु॑वत् । ऋ॒भुर्वाज॑ ऋभु॒क्षाः प॑त्यते॒ शवोऽव॑ क्ष्णौमि॒ दास॑स्य॒ नाम॑ चित् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

harī nv asya yā vane vide vasv indro maghair maghavā vṛtrahā bhuvat | ṛbhur vāja ṛbhukṣāḥ patyate śavo va kṣṇaumi dāsasya nāma cit ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

हरी॒ इति॑ । नु । अ॒स्य॒ । या । वने॑ । वि॒दे । वसु॑ । इन्द्रः॑ । म॒घैः । म॒घऽवा॑ । वृ॒त्र॒ऽहा । भु॒व॒त् । ऋ॒भुः । वाजः॑ । ऋ॒भु॒क्षाः । प॒त्य॒ते॒ । शवः॑ । अव॑ । क्ष्णौ॒मि॒ । दास॑स्य । नाम॑ । चि॒त् ॥ १०.२३.२

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:23» मन्त्र:2 | अष्टक:7» अध्याय:7» वर्ग:9» मन्त्र:2 | मण्डल:10» अनुवाक:2» मन्त्र:2


458 बार पढ़ा गया

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अस्य या हरी नु वसु विदे) इस राजा के जो दुःखहर्ता और सुख-आहर्ता सभा-विभाग और सेना-विभाग धन को प्राप्त कराते हैं, (मघैः-मघवा-इन्द्रः) धनों के द्वारा धनवान् होता है, वह राजा है। (वृत्रहा भुवत्) शत्रुहन्ता होता है। (ऋभुः-वाजः-ऋभुक्षाः) मेधावी बलवान् तथा महान् होता हुआ (पत्यते) स्वामित्व करता है-शासन करता है। (दासस्य शवः-नामचित्-अवक्ष्णौमि) जो हमें क्षीण करता है, उसके बल और नाम को भी तेजोहीन कर देता-नष्ट कर देता है ॥२॥
भावार्थभाषाः - राजा के सभाविभाग और सेनाविभाग दुःखनाशक और सुखप्रापक होते हुए प्रजा के लिए धन प्राप्त करानेवाले होने चाहिए। ऐसा राजा शत्रुनाशक, मेधावी, महान् बलवान् होकर शासन करता है। प्रजा को दुःख देनेवाले शत्रु के बल और नाम तक को मिटा देता है ॥२॥
458 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

वासना का समूल विनाश

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (ये) = मेरे (हरी) = इन्द्रियाश्व, (या) = जिनको कि मैं (वने) = [win] विजय करता हूँ, (नु) = अब (अस्य) = इस प्रभु के हैं, अर्थात् अब ये इन्द्रियाँ विषयाभिमुख न होकर प्रभु-प्रवण हो गयी हैं । वस्तुतः ऐसा होने पर ही मैं (वसु विदे) = वास्तविक धन को प्राप्त करता हूँ । [२] वह (इन्द्रः) = सब शत्रुओं का विद्रावण करनेवाला प्रभु जो कि (मघैः मघवा) = सब ऐश्वर्यों से ऐश्वर्य सम्पन्न है, (वृत्रहा भुवत्) = वासना का नष्ट करनेवाला होता है। प्रभु प्रवणता से ही वासनाओं का विनाश होता है। [३] ये प्रभु (ऋभुः) = ऋत से देदीप्यमान हैं, प्रभु का ऋत सृष्टि में सर्वत्र कार्य कर रहा है। (वाजः) = वे प्रभु शक्ति के पुञ्ज हैं। वस्तुतः ऋत में ही शक्ति है। जब प्रभु ऋत से चमकते हैं तो उन्हें शक्ति का पुञ्ज होना ही चाहिए। (ऋभुक्षाः) = वे प्रभु महान् हैं। अथवा ऋत से चमकने वालों में ही निवास करनेवाले हैं [ऋभु + क्षि] । जब हम अपने जीवन को नियमित बनाते हैं तो हम अपने को प्रभु का अधिष्ठान बनाते हैं । वे प्रभु (शवः पत्यते) = सब बलों के स्वामी हैं । सो जब भी हम अपने हृदयों में प्रभु को प्रतिष्ठित करेंगे तो हमारे में भी उस बल का संचार होगा। [४] इस प्रभु के बल से बल सम्पन्न होकर मैं दासस्य इस विनाशक 'काम' नामक आसुरवृत्ति के (नाम चित्) = [नम्यते ऽनेन] (शिरः सा) = सिर को ही (अव क्ष्णौमि) = सुदूर हिंसित करता हूँ अथवा इस वृत्त के नाम को भी नष्ट कर डालता हूँ। इसको नामावशेष भी नहीं रहने देता।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम इन्द्रियों को जीतकर प्रभु-प्रवण बनायें। यही जीवन को उत्तम बनाने का मार्ग है। इससे हम प्रभु शक्ति सम्पन्न होकर वासना को समूल नष्ट कर देंगे।
458 बार पढ़ा गया

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अस्य या हरी नु वसु विदे) अस्य राज्ञो यौ दुःखापहर्त्ता सुखाहर्त्ता च सभाविभागः सेनाविभागश्च धनं वेदयेते (मघैः-मघवा-इन्द्रः) धनैर्धनवान् भवति स राजा (वृत्रहा भुवत्) शत्रुहन्ता भवति (ऋभुः-वाजः-ऋभुक्षाः) मेधावी “ऋभुर्मेधावी” [निघ० ३।१५] बलवान् तथा महान् “ऋभुक्षाः-महन्नाम” [निघं० ३।३] (पत्यते) स्वामित्वं करोति “पत्यते ऐश्वर्यकर्मा” [निघं० २।२१] (दासस्य शवः-नाम चित्-अवक्ष्णौमि) योऽस्मान् दासयति क्षिणोति तस्य बलं नामापि नाशयति “पुरुषव्यत्ययश्छान्दसः ॥२॥
458 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - The wealth of energy which the currents bring into the solar rays are universal whereby Indra becomes powerful with natural forces to break the dark clouds of rain. Master of spiritual and physical strength, Indra rules and protects the wealth, power and honour of the world, under that protection I too wish to eliminate even the last trace of negativity and force of destruction.