पदार्थान्वयभाषाः - [१] (अहस्ता अपदी) = बिना हाथ-पैर वाली भी (क्षाः) = यह पृथिवी (वेद्यानाम्) = [वेद+य] उत्तम ज्ञानियों के (शचीभिः) = प्रज्ञापूर्वक किये गये कर्मों से (यद् वर्धत) = जो बढ़ जाती है तो हे प्रभो ! आप ही (परि) = चारों ओर व्याप्त होनेवाले 'शरीर, मन व बुद्धि' सभी को अपना अधिष्ठान बनानेवाले, (प्रदक्षिण् इत्) = अत्यन्त चतुर (शुष्णम्) = इस सुखा देनेवाले काम को (निशिश्नथः) = निश्चय' से नष्ट किया करते हैं जिससे (विश्वायवे) = पूर्ण जीवन को हम प्राप्त कर सकें। [२] पृथ्वी के हाथ-पाँव नहीं है, ‘वह स्वयं चलकर हमारे पास आयेगी, और हमें भोग्य वस्तुएँ प्राप्त करायेगी ऐसी बात नहीं है। इस पृथ्वीरूप गौ को तो ज्ञानपूर्वक श्रम करके ही दोह सकते हैं। ज्ञानपूर्वक श्रम के होने पर यह पृथ्वी हमारे लिये भोग्य पदार्थों को खूब बढ़ानेवाली होगी। [३] उन भोग्य पदार्थों के बढ़ने पर यह बड़ा भारी खतरा उत्पन्न हो जाता है कि हम उन भोगों में फँस न जाएँ । यह भोगासक्ति ही काम्य पदार्थों के उपभोग से अधिकाधिक बढ़ती जाती है और यह हमारे लिये शुष्णासुर बन जाती है। यह कामदेव बड़ा कुशल है, [प्रदक्षिणं] फूलों के ही धनुष से और फूलों के ही बाणों से हमारी सब ज्ञानेन्द्रियों पर इकट्ठा ही आक्रमण करता है, इसी से इसका नाम 'पञ्चबाण' भी हो गया है। इस को तो प्रभु ही मारते हैं, हमारे लिये इसके मारने का सम्भव नहीं होता । [४] इस शुष्ण के समाप्त हो जाने पर ही हमारा जीवन पूर्ण बनता है। काम तो 'शरीर, मन व बुद्धि' सभी को ही नष्ट कर डालता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - ज्ञानपूर्वक कर्मों द्वारा हम इस पृथ्वी से अपने भोग्य पदार्थों को प्राप्त करें। प्रभु स्मरण करते हुए हम उन पदार्थों के प्रति आसक्त न हो जाएँ। और इस प्रकार अनासक्त भाव से चलते हुए हम पूर्ण जीवन को प्राप्त कर सकें ।