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म॒क्षू ता त॑ इन्द्र दा॒नाप्न॑स आक्षा॒णे शू॑र वज्रिवः । यद्ध॒ शुष्ण॑स्य द॒म्भयो॑ जा॒तं विश्वं॑ स॒याव॑भिः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

makṣū tā ta indra dānāpnasa ākṣāṇe śūra vajrivaḥ | yad dha śuṣṇasya dambhayo jātaṁ viśvaṁ sayāvabhiḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

म॒क्षु । ता । ते॒ । इ॒न्द्र॒ । दा॒नऽअ॑प्न॑सः । आ॒क्षा॒णे । शू॒र॒ । व॒ज्रि॒ऽवः॒ । यत् । ह॒ । शुष्ण॑स्य । द॒म्भयः॑ । जा॒तम् । विश्व॑म् । स॒याव॑ऽभिः ॥ १०.२२.११

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:22» मन्त्र:11 | अष्टक:7» अध्याय:7» वर्ग:8» मन्त्र:1 | मण्डल:10» अनुवाक:2» मन्त्र:11


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (शूर वज्रिवः-इन्द्र) हे पराक्रमी ओजस्वी परमात्मन् ! या वज्रास्त्रवाले राजन् ! (ते दानाप्नसः) तेरे मोक्ष दान कर्मवाले या रक्षण कर्मवाले के (ता) वे दानकर्म (आक्षाणे मक्षु) व्याप्त होते हुए तेरे स्वरूप या मोक्ष में तथा हे राजन् ! तेरे प्रवर्तमान संग्राम में तुरन्त (शुष्णस्य यत्-ह विश्वं जातम्) शोषण करनेवाले पाप शत्रु के समस्त प्रसिद्धरूप या बल को (सयावभिः-दम्भयः) जो समान जाते हैं, उपासकों में प्राप्त स्वसमान गुणों द्वारा या समान योद्धाओं द्वारा नष्ट कर ॥११॥
भावार्थभाषाः - ओजस्वी तथा पराक्रमी परमात्मा या राजा अपने मोक्षप्रदायक कर्मों द्वारा रक्षण करता है। व्याप्त हुआ या प्राप्त हुआ शोषण करनेवाले पापों या शत्रुओं को वह नष्ट करता है ॥११॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

शुष्ण के कुल का दंभन

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (शूर) = शत्रुओं का संहार करनेवाले ! (वज्रिवः) = वज्रयुक्त हाथों वाले (इन्द्र) = सब शत्रुओं के द्रावक प्रभो ! (ता:) = वे (दानाप्नस:) = दानरूप कर्म वाली प्रजाएँ (मक्षू) = शीघ्र ही (ते) = आपके (आक्षाणे) = व्यापन में स्थित होती हैं । [२] हे जीव ! यह वह स्थिति होती है (यत् ह) = जिसमें कि तू (शुष्णस्य) = विरह संताप से शुष्क करनेवाले काम के (विश्वं जातम्) = सम्पूर्ण अपत्यों को, बीजमात्र को (सयावभिः) = साथ गति करनेवाले प्राणों के द्वारा (दम्भयः) = नष्ट कर देता है। [३] दानशील प्रजाएँ भोगासक्त न होकर प्रभु के व्यापन में स्थित होती हैं । ये प्रजाएँ प्राणसाधना के द्वारा वासना को जड़मूल से उखाड़ देती हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम दान की वृत्ति को अपनाकर प्रभु के बनें और काम को भस्म कर डालें ।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (शूर वज्रिवः-इन्द्र) हे पराक्रमिन् ओजस्विन् परमात्मन् वज्रास्त्रवन् राजन् वा ! (ते दानाप्नसः) तव मोक्षदानकर्मवतो रक्षणकर्मवतो वा “अप्सः कर्मनाम” [निघ० २।१] (ता) तानि दानकर्माणि रक्षणकर्माणि वा (आक्षाणे मक्षु) आश्नुवाने व्याप्नुवाने तव परमात्मन् तव स्वरूपे मोक्षे, तथा राजन् ! तव प्रवर्तमाने सङ्ग्रामे वा ‘आक्षाणः-आश्नुवानः” [निरु० ३।१०] ‘अशूङ् व्याप्तौ ततः शानचि सिप् च बहुलं छन्दसि’ “सिब्बहुलं लेटि” [अष्टा० ३।१।३४] बहुलग्रहणादन्यत्रापि भवति, मक्षु सद्यः-एव (शुष्णस्य यत्-ह विश्वं जातम्) शोषयितुः-पापस्य शत्रोर्वा “शुष्णस्य शोषयितुः” [निरु० ५।१६] “शुष्णस्य शोशकस्य शत्रोः” [ऋ० १।१२१।१० दयानन्दः] यत् खलु समस्तं प्रसिद्ध रूपं बलं वा तत् (सयावभिः-दम्भयः) “ये समानं यान्ति ते सयावानस्तैः” [ऋ० १।४४।१३ दयानन्दः] स्वसमानगुणैरुपासके प्राप्तैर्यद्वा स्वसमान-योद्धृभिर्नाशय-नाशयसि वा। “दम्भय-छिन्धि” [ऋ० १।५४।६ दयानन्दः] ॥११॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra, ruler most potent and wielder of the thunderbolt, adamantine will and justice, most generous giver, instant are your gifts of protection, charity and advancement in matters of success, achievement and fulfilment, since with your assistant cooperative forces you destroy all evils of darkness, ignorance and want of the world created by demonic forces of negativity and destruction.