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त्वां य॒ज्ञेष्वृ॒त्विजं॒ चारु॑मग्ने॒ नि षे॑दिरे । घृ॒तप्र॑तीकं॒ मनु॑षो॒ वि वो॒ मदे॑ शु॒क्रं चेति॑ष्ठम॒क्षभि॒र्विव॑क्षसे ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

tvāṁ yajñeṣv ṛtvijaṁ cārum agne ni ṣedire | ghṛtapratīkam manuṣo vi vo made śukraṁ cetiṣṭham akṣabhir vivakṣase ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

त्वाम् । य॒ज्ञेषु॑ । ऋ॒त्विज॑म् । चारु॑म् । अ॒ग्ने॒ । नि । से॒दि॒रे॒ । घृ॒तऽप्र॑तीकम् । मनु॑षः । वि । वः॒ । मदे॑ । शु॒कम् । चेति॑ष्ठम् । अ॒क्षऽभिः॑ । विव॑क्षसे ॥ १०.२१.७

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:21» मन्त्र:7 | अष्टक:7» अध्याय:7» वर्ग:5» मन्त्र:2 | मण्डल:10» अनुवाक:2» मन्त्र:7


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अग्ने) हे अग्रणायक परमात्मन् ! (यज्ञेषु) अध्यात्मयज्ञ प्रसङ्गों में उसको निमित्त बनाकर (त्वां चारुं घृतप्रतीकम् ऋत्विजम्) तुझ सेवनयोग्य तेजस्वी, अध्यात्मयज्ञ के सम्पादक को (शुक्रं चेतिष्ठम्) शुभ्र अत्यन्त चेतनावाले को (मनुषः निषेदिरे) उपासक जन आश्रय करते हैं (वः-मदे वि) तुझे हर्ष के निमित्त विशेषरूप से वरण करते हैं (विवक्षसे) तू विशिष्ट महान् है ॥७॥
भावार्थभाषाः - अध्यात्मयज्ञ के प्रसङ्गों में तेजस्वी, अध्यात्मयज्ञ के सम्पादक, सावधान करनेवाले परमात्मा की उपासकजन शरण लें, वही आनन्द हर्ष का साधक है और महान् है ॥७॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'शुक्र - चेतिष्ठ' प्रभु

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (अग्ने) = अग्रेणी प्रभो ! (यज्ञेषु) = यज्ञों में (ऋत्विजम्) = समय-समय पर उपासना के योग्य (चारुम्) = अत्यन्त रमणीय आपको (मनुषः) = विचार पूर्वक कर्म करनेवाले लोग (निषेदिरे) = स्थापित करते हैं। समझदार लोग यज्ञों द्वारा ही प्रभु का उपासन करते हैं। उस उस समय के अनुसार होनेवाले लोकहितात्मक कर्मों से इनका प्रभु-पूजन चलता है। वे प्रभु 'चारु' हैं, सुन्दर ही सुन्दर हैं। प्रभु में किसी प्रकार की न्यूनता नहीं। इनका जीवन भी न्यूनताओं से रहित होकर सुन्दरता को प्राप्त करनेवाला होता है । [२] उस प्रभु को ये विचारशील पुरुष अपने में स्थापित करते हैं जो कि (घृतप्रतीकम्) = [घृत-व्याप्तै तेजोभिः, प्रतीक = अतिशयेन ज्ञातारं] व्याप्त तेजस्विताओं के साथ अतिशयेन ज्ञाता हैं। ये उपासक भी अपने में तेजस्विता व ज्ञान का समन्वय करने का प्रयत्न करते हैं। [३] वे उस प्रभु का उपासन करते हैं जो कि (शुक्रम्) = [शुक गतौ] अधिक से अधिक क्रियाशील हैं और (चेतिष्ठम्) = सर्वातिशायी चेतना व ज्ञान वाले हैं। एक उपासक भी क्रियाशील व ज्ञानी बनता है । यह ज्ञानी पुरुष कभी अकर्मण्य नहीं होता। [४] इस प्रकार ये उपासक (वः) = आपकी प्राप्ति के (विमदे) = प्रकृष्ट आनन्द में (विवक्षसे) = विशिष्ट उन्नति के लिये होते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु का उपासक तेजस्वी व ज्ञानी होता है, यह अपने में क्रियाशीलता व ज्ञान का समन्वय करके चलता है।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अग्ने) हे अग्रणायक परमात्मन् ! (यज्ञेषु) अध्यात्मयज्ञप्रसङ्गेषु तान् निमित्तीकृत्य (त्वां चारुं घृतप्रतीकम्-ऋत्विजम्) त्वां चरणयोग्यं सेवनीयं तेजसा प्रत्यक्तं तेजस्विनम् “तेजो वै घृतम्” [मै० १।६।८] अध्यात्मयज्ञसम्पादकम् (शुक्रं चेतिष्ठम्) शुभ्रम्-अतिचेतयितारम् (मनुषः-निषेदिरे) मनुष्या उपासकजनाः “सुपां सुलुक्……” [अष्टा० ८।१।३९] इति जसः स्थाने सुप्रत्ययः। आश्रितवन्तः-आश्रयन्ते (वः-मदे वि) त्वां हर्षाय विशिष्टं वृणुयाम (विवक्षसे) विशिष्टतया महानसि ॥७॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - People set, establish and celebrate you in yajnas, Agni, charming, shining with oblations of ghrta, bright and pure, most illuminative accomplisher of yajna according to the seasons and your vision of the world. Agni, you are waxing great for your devotees.