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आग्निं न स्ववृ॑क्तिभि॒र्होता॑रं त्वा वृणीमहे । य॒ज्ञाय॑ स्ती॒र्णब॑र्हिषे॒ वि वो॒ मदे॑ शी॒रं पा॑व॒कशो॑चिषं॒ विव॑क्षसे ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

āgniṁ na svavṛktibhir hotāraṁ tvā vṛṇīmahe | yajñāya stīrṇabarhiṣe vi vo made śīram pāvakaśociṣaṁ vivakṣase ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

आ । अ॒ग्निम् । न । स्ववृ॑क्तिऽभिः । होता॑रम् । त्वा॒ । वृ॒णी॒म॒हे॒ । य॒ज्ञाय॑ । स्ती॒र्णऽब॑र्हिषे । वि । वः॒ । मदे॑ । शी॒रम् । पा॒व॒कऽशो॑चिषम् । विव॑क्षसे ॥ १०.२१.१

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:21» मन्त्र:1 | अष्टक:7» अध्याय:7» वर्ग:4» मन्त्र:1 | मण्डल:10» अनुवाक:2» मन्त्र:1


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ब्रह्ममुनि

इस सूक्त में अग्नि शब्द से परमात्मा वर्णित है तथा उसकी भिन्न-भिन्न प्रकार से स्तुतियाँ कही गयी हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (यज्ञाय-अग्निं न) जैसे होम यज्ञ के लिए अग्नि को वरते हैं, वैसे ही (त्वा पावकशोचिषं क्षीरम्) तुझ पवित्र दीप्तिवाले सर्वत्रशायी-सर्वव्यापक (होतारम्) अध्यात्मयज्ञ के सम्पादक परमात्मा को (स्ववृक्तिभिः) अपनी स्तुतियों से (स्तीर्णबर्हिषे वृणीमहे) आच्छादित होता है अन्तरिक्ष-अन्तर्हित हृदयाकाश जिसके द्वारा, वैसे अध्यात्मयज्ञ के लिए वरते हैं (विवक्षसे वः मदे) महान् हर्ष के निमित तुझे विशिष्टरूप में वरते हैं ॥१॥
भावार्थभाषाः - होमयज्ञ में जैसे अग्नि को वरते हैं, ऐसे ही अध्यात्मयज्ञ में हृदय के अन्दर उस पवित्र दीप्तिमान् सर्वत्र व्यापक परमात्मा को विशेष आनन्दप्राप्ति के लिए वरना चाहिए ॥१॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'मैं' को छोड़कर

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (होतारम्) = इस सृष्टियज्ञ के होता - सम्पूर्ण आवश्यक वस्तुओं के देनेवाले (अग्निम्) = अग्रेणी (त्वा) = आपको (न) = [सं प्रति] अब (स्ववृक्तिभिः) = 'मैं' के वर्जन के द्वारा, अर्थात् 'मैं' से ऊपर उठकर आवृणीमहे सर्वथा वरण करते हैं। जहाँ 'मैं' और 'मेरा' होता है वहीं प्रभु का निवास नहीं होता । 'मैं' गई और 'प्रभु' आये। मैं और प्रभु का साथ-साथ रहना नहीं सम्भव । दिव्यता की पराकाष्ठा निरभिमानता ही है। [२] प्रभु का वरण इसलिये करते हैं कि (यज्ञाय) = हमारे में यज्ञ की भावना की वृद्धि हो । ('स्तीर्णबर्हिषे') = ' बिछाया है वासनाशून्य हृदय जिसने ऐसा बनने के लिये । आये हुए अतिथि के लिये जैसे आसन देते हैं, उसी प्रकार प्रभु के आतिथ्य के लिये 'वासनाशून्य - हृदय' रूप आसन ही तो बिछाया जाता है। निर्वासन हृदय में ही प्रभु का निवास है । [३] उस प्रभु का वरण करते हैं जो कि (वः) = तुम्हारे (मदे) = आनन्द में (विशीरम्) = विशेषरूप से शयन व निवास करनेवाले हैं। अर्थात् प्रभु उसे ही प्राप्त होते हैं जो कि सुख-दुःख में सदा आनन्दित रहता है । खीझने की मनोवृत्ति वाले को प्रभु की प्राप्ति नहीं होती। (पावकशोचिषम्) = वे प्रभु शोधकदीप्ति वाले हैं। हमें प्रभु प्राप्त होते हैं तो उन प्रभु के ज्ञान का प्रकाश हमारे सब पापों व मलों को धो डालता है । [४] (विवक्षसे) = हम प्रभु को विशिष्ट उन्नति के लिये प्राप्त करते हैं [वक्ष् To grow]। प्रभु प्राप्ति से सब दिशाओं में हम अधिकाधिक उन्नत होते चलते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु का वरण 'मैं' के त्याग से होता है। प्रभु वरण करनेवाला निरन्तर उन्नतिपथ पर आगे बढ़ता है।
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ब्रह्ममुनि

अस्मिन् सूक्तेऽग्निशब्देन परमात्मा वर्ण्यते तस्य भिन्नभिन्नप्रकारैः स्तुतयश्चोच्यन्ते।

पदार्थान्वयभाषाः - (यज्ञाय-अग्निं न) यथा होमयज्ञायाग्निं वृणीमहे तथा (त्वा पावकशोचिषं क्षीरम्) त्वां पवित्रदीप्तिमन्तं सर्वत्र शायिनं सर्वत्रव्यापकं “शीरं पावकशोचिषम्” पावकदीप्तिम्। अनुशायिनमिति वाशिनमिति वा” [निरु० ४।१४] (होतारम्) अध्यात्मयज्ञसम्पादयितारमग्रणायकं परमात्मानम् (स्ववृक्तिभिः) आत्मस्तुतिभिः “सुवृक्तिभिः शोभनाभिः स्तुतिभिः” [निरु० २।२४] (स्तीर्णबर्हिषे वृणीमहे) आच्छादितान्तरिक्षं हृदयाकाशो येन तथा भूतायाध्यात्मयज्ञाय “बर्हिः-अन्तरिक्षनाम” [निघ० १।३] (विवक्षसे वः-मदे वि) अथ महति हर्षनिमित्ते त्वां ‘वः’ व्यत्ययेन बहुवचनं विशिष्टं वृणुयाम “विवक्षसे महन्नाम” [निघ० ३।३] ॥१॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Like fire for comfort, with our own holy chant for the internal yajna of our spiritual purification and your joy, O fellow yajakas, we choose Agni, high priest of cosmic yajna, all pervasive purifier by the white heat of his divine radiance. Verily the lord is great and glorious for you.