नरो॒ ये के चा॒स्मदा विश्वेत्ते वा॒म आ स्यु॑: । अ॒ग्निं ह॒विषा॒ वर्ध॑न्तः ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
naro ye ke cāsmad ā viśvet te vāma ā syuḥ | agniṁ haviṣā vardhantaḥ ||
पद पाठ
नरः॑ । ये । के । च॒ । अ॒स्मत् । आ । विश्वा॑ । इत् । ते । वा॒मे । आ । स्यु॒रिति॑ स्युः । अ॒ग्निम् । ह॒विषा॑ । वर्ध॑न्तः ॥ १०.२०.८
ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:20» मन्त्र:8
| अष्टक:7» अध्याय:7» वर्ग:3» मन्त्र:2
| मण्डल:10» अनुवाक:2» मन्त्र:8
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ब्रह्ममुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (ये के च-अस्मत्-नराः) जो कोई हमारे में स्तोता या प्रशंसक जन हैं, (विश्वा) सब (ते) वे (इत्) ही (वामे) वननीय भजनीय (हविषा) प्रार्थना से (अग्नि) परमात्मा या राजा को प्रशंसित करते हुए (आ-आस्युः) समन्तरूप से आश्रय करें-करते हैं ॥८॥
भावार्थभाषाः - सब श्रेष्ठ जन परमात्मा या राजा को प्रार्थनाओं द्वारा प्रशंसाओं द्वारा बढ़ाते हुए उसके आश्रय में रहते हैं ॥८॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
नर की वाम में स्थिति
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (अस्मत्) = हमारे में से (ये के च) = जो कोई भी (नरः) = [नरम् ] संसार के विषयों में न फँसनेवाले तथा [नृ नये] अपने को उन्नतिपथ पर आगे ले चलनेवाले व्यक्ति हों (विश्वा इत् ते) = वे सब निश्चय से वामे उस सुन्दर वननीय उपासनीय प्रभु में (आस्युः) = सब प्रकार से हों । अर्थात् ब्रह्मस्थ व ब्रह्म का उपासक होने का उपाय यही है कि हम 'नर' बनें इस संसार में नर बनकर कार्य करें। [२] नर बनकर कार्य करनेवाला व्यक्ति आसक्त नहीं होता। इसका जीवन हविरूप होता है । हम इस (हविषा) = हवि के द्वारा - दानपूर्वक अदन के द्वारा (सदा) = सदा यज्ञशेष के सेवन के द्वारा (अग्निम्) = उस अग्रेणी प्रभु का (वर्धन्तः) = वर्धन करनेवाले हों । प्रभु की उपासना हवि के द्वारा ही होती है 'कस्मै देवाय हविषा विधेम' । प्रभु के उपासक सदा 'वामे आस्युः 'सुन्दर सेवनीय पदार्थों में स्थित होते हैं। इन्हें इन पदार्थों की कमी नहीं हो जाती ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- दानपूर्वक अदन के द्वारा प्रभु का वर्धन करते हुए हम सदा नर बनें और ब्रह्मनिष्ठ व सब सुन्दर वस्तुओं को प्राप्त करनेवाले हों ।
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ब्रह्ममुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (ये के च-अस्मत्-नरः) ये केचन-अस्माकं पक्षे स्तोतारः प्रशंसका जनाः (विश्वा) सर्वे ‘आकारादेशश्छान्दसः’ (ते-इत्) ते हि (वामे) वननीये भजनीयवस्तुनिमित्ते (हविषा) प्रार्थनया (अग्निं वर्धन्तः) परमात्मानं राजानं वा वर्धयन्तः प्रशंसन्तः (आ-आस्युः) समन्तादाश्रयीकुर्वन्तु ॥८॥
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - Those leading lights of humanity among us who serve and exalt Agni with yajnic offerings of homage may, we pray, enjoy your love and favour.
