पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यः गोपाः) = जो इन्द्रिय रूप गौवों का रखवाला (व्ययनम्) = इन्द्रियों के विविध विषयों में जाने को (उदानट्) = व्याप्त करता है, अर्थात् जब इन्द्रियाँ विषयों में जाती हैं, तो जो उन इन्द्रियों का रक्षक बनकर उनके साथ जाता है और (यः) = जो उनके (परायणम्) = विषयों से फिर वापिस आने को (उदानट्) = व्याप्त करता है, अर्थात् विषयों का ज्ञान प्राप्त करने के बाद, जो उन इन्द्रियों को उन विषयों में न फँसे रहने देकर उनकी व्यावृत्ति का कारण बनता है। [२] और इस प्रकार जो (आवर्तनम्) = सर्वत्र विषयों में वर्तन को और (निवर्तनम्) = उन विषयों से निवृत्ति को व्याप्त करता है, वह (गोपा निवर्तताम्) = विषय व्यावृत्त हो, और पुनः अपने घर ब्रह्मलोक में लौटनेवाला बने ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - हम विषयों के तत्त्वज्ञान के लिये आत्मवश्य इन्द्रियों के द्वारा उनमें विचरें और उनमें ही न फँसे रहकर फिर से अपने मूलगृह ब्रह्मलोक में लौटनेवाले बनें ।