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य उ॒दान॒ड्व्यय॑नं॒ य उ॒दान॑ट् प॒राय॑णम् । आ॒वर्त॑नं नि॒वर्त॑न॒मपि॑ गो॒पा नि व॑र्तताम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ya udānaḍ vyayanaṁ ya udānaṭ parāyaṇam | āvartanaṁ nivartanam api gopā ni vartatām ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यः । उ॒त्ऽआन॑ट् । वि॒ऽअय॑नम् । यः । उ॒त्ऽआन॑ट् । प॒रा॒ऽअय॑नम् । आ॒ऽवर्त॑नम् । नि॒ऽवर्त॑नम् । अपि॑ । गो॒पाः । नि । व॒र्त॒ता॒म् ॥ १०.१९.५

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:19» मन्त्र:5 | अष्टक:7» अध्याय:7» वर्ग:1» मन्त्र:5 | मण्डल:10» अनुवाक:2» मन्त्र:5


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (यः गोपाः) जो गौवों, प्रजाओं, इन्द्रियों का स्वामी परमात्मा है, और (व्ययनम्-उदानट्) जो विशिष्ट गमन का अधिष्ठाता है (यः परायणम् उदानट्) जो परगमन का भी अधिष्ठाता है (आवर्तनं निवर्तनम्-अपि) और जो सुखसाधन के प्रवर्तन और दुःख से निवर्तन का भी अधिष्ठाता है (गोपाः निवर्तताम्) वह गौवों, प्रजाओं और इन्द्रियों का रक्षक परमात्मा हमें प्राप्त हो ॥५॥
भावार्थभाषाः - गौवों, प्रजाओं, इन्द्रियों का रक्षक परमात्मा उनकी सारी गति प्रवृत्तियों का अधिष्ठाता है। वह हमें प्राप्त हो ॥५॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

मूलगृह में फिर लौटना

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यः गोपाः) = जो इन्द्रिय रूप गौवों का रखवाला (व्ययनम्) = इन्द्रियों के विविध विषयों में जाने को (उदानट्) = व्याप्त करता है, अर्थात् जब इन्द्रियाँ विषयों में जाती हैं, तो जो उन इन्द्रियों का रक्षक बनकर उनके साथ जाता है और (यः) = जो उनके (परायणम्) = विषयों से फिर वापिस आने को (उदानट्) = व्याप्त करता है, अर्थात् विषयों का ज्ञान प्राप्त करने के बाद, जो उन इन्द्रियों को उन विषयों में न फँसे रहने देकर उनकी व्यावृत्ति का कारण बनता है। [२] और इस प्रकार जो (आवर्तनम्) = सर्वत्र विषयों में वर्तन को और (निवर्तनम्) = उन विषयों से निवृत्ति को व्याप्त करता है, वह (गोपा निवर्तताम्) = विषय व्यावृत्त हो, और पुनः अपने घर ब्रह्मलोक में लौटनेवाला बने ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - हम विषयों के तत्त्वज्ञान के लिये आत्मवश्य इन्द्रियों के द्वारा उनमें विचरें और उनमें ही न फँसे रहकर फिर से अपने मूलगृह ब्रह्मलोक में लौटनेवाले बनें ।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (यः गोपाः) यो गवां पालकः, प्रजानां स्वामी, तथेन्द्रियाणां प्रवर्तकश्च परमात्मा (व्ययनम्-उदानट्) विशिष्टगमनमधितिष्ठति (यः-परायणम्-उदानट्) यः परे गमनं विपरीतगमनं प्रवर्तनमधितिष्ठति (आवर्तनं निवर्तनम्-अपि) सुखसाधने प्रवर्तनं दुःखात् खलु निवर्तनं चाधितिष्ठति (गोपाः-निवर्तताम्) स गवां प्रजानामिन्द्रियाणां रक्षकः परमात्मा अस्मदभिमुखं प्राप्तो भवतु ॥५॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Whatever the expense out, whatever the investment out, revolvement of wealth, energy and assets, whatever the total state of economy in action, let the managing powers constantly watch and control.