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त्रिं॒शद्धाम॒ वि रा॑जति॒ वाक्प॑तं॒गाय॑ धीयते । प्रति॒ वस्तो॒रह॒ द्युभि॑: ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
triṁśad dhāma vi rājati vāk pataṁgāya dhīyate | prati vastor aha dyubhiḥ ||
पद पाठ
त्रिं॒शत् । धाम॑ । वि । रा॒ज॒ति॒ । वाक् । प॒त॒ङ्गाय॑ । धी॒य॒ते॒ । प्रति॑ । वस्तोः॑ । अह॑ । द्युऽभिः॑ ॥ १०.१८९.३
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ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:189» मन्त्र:3
| अष्टक:8» अध्याय:8» वर्ग:47» मन्त्र:3
| मण्डल:10» अनुवाक:12» मन्त्र:3
ब्रह्ममुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (वाक्) पृथिवी (वस्तोः) दिन के-अहोरात्र के (त्रिंशत्-धाम) तीस मुहूर्त घड़ी नामक को (विराजति) प्राप्त होती है (द्युभिः) दिनों से दिनों दिन (पतङ्गाय) सूर्य में (प्रति धीयते-अह) निरन्तर आश्रय लेती है ॥३॥
भावार्थभाषाः - पृथिवी पर दिन-रात में तीस मुहूर्त घड़ियों के रूप में होते हैं, पृथिवी के सूर्य पर आश्रित होने पर ॥३॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
प्रभु का जप
पदार्थान्वयभाषाः - [१] यह साधक (त्रिंशत् धाम) = तीसों धाम, तीसों स्थानों में [ज्योतित्व पर दिन-रात्रि में तप होनेवाले क्रान्तिवृत्त पर ६० अंश चिह्नित हैं जो दिन की ३० घड़ी व मास की ३० तिथियों का निर्देश करते हैं ज०] (विराजति) = चमकता है, यह सदा दीप्ति को देखनेवाला बनता है । [२] (वाक्) = इस की वाणी (पतंगाय) = उस सूर्यसम ज्योतिवाले ब्रह्म के लिये (धीयते) = धारण की जाती है 'ब्रह्म सूर्यसमं ज्योतिः ' । [२] यह साधक (प्रति वस्तोः) = प्रतिदिन (अह) = [एव] निश्चय से (द्युभिः) = ज्ञान - ज्योतियों से उपलक्षित होता है, इसका ज्ञान उत्तरोत्तर बढ़ता ही जाता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम सदा प्रभु के नाम का जप करें व ज्ञान ज्योति से दीप्त हों । सूक्त की भावना यही है कि हम साधनामय जीवन बिताते हुए ज्ञान से दीप्त होने का प्रयत्न करें। इस प्रयत्न के करने से हम 'अघमर्षण' पापों को कुचलनेवाले होंगे तथा माधुच्छन्दस = अत्यन्त मधुर इच्छाओंवाले होंगे। यही अगले सूक्त का ऋषि है। वह प्रभु से बारम्बार किये जानेवाले इस सृष्टि प्रलय रूप कार्य का स्मरण करता हुआ नश्वरता का चिन्तन करता है । यह चिन्तन उसके लिये 'अघमर्षण' बनने में सहायक होता है-
ब्रह्ममुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (वाक्-वस्तोः-त्रिंशत्-धाम-विराजति) पृथिवी “इयं पृथिवी वै वाक्” [श० ४।६।९।१६] “वागिति पृथिवी” [जै० ३।४।२२।२१] दिनस्य-अहोरात्रयोः “वस्तोः-अहर्नाम” [निघ० १।९] त्रिंशन्मुहूर्तानि धामानि घटिकाख्यानि प्राप्नोति (द्युभिः-पतङ्गाय प्रतिधीयते-अह) दिनैः-सा पृथिवी सूर्ये ‘सप्तम्यर्थे चतुर्थी’ आश्रयति, “त्रिंशद्धाम विराजति वाक् पतङ्गे-अशिश्रियत्” [अथर्व० ९।३।३] ॥३॥
डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - Thirty stages of the day from every morning to evening does the sun rule with the rays of its light while songs of adoration are raised and offered to the mighty ‘Bird’ of heavenly space.
