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यद॒दो वा॑त ते गृ॒हे॒३॒॑ऽमृत॑स्य नि॒धिर्हि॒तः । ततो॑ नो देहि जी॒वसे॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yad ado vāta te gṛhe mṛtasya nidhir hitaḥ | tato no dehi jīvase ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यत् । अ॒दः । वा॒त॒ । ते॒ । गृ॒हे । अ॒मृत॑स्य । नि॒धिः । हि॒तः । ततः॑ । नः॒ । दे॒हि॒ । जी॒वसे॑ ॥ १०.१८६.३

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:186» मन्त्र:3 | अष्टक:8» अध्याय:8» वर्ग:44» मन्त्र:3 | मण्डल:10» अनुवाक:12» मन्त्र:3


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (वात) हे वायो ! (ते गृहे) तेरे ग्रहण अपने अन्दर प्रतिष्ठा करने पर (यत्) जो (अदः) वह (अमृतस्य निधिः) अमरण-जीवन की निधि कोष (हितः) निहित है (ततः) उसमें से (नः) हमारे (जीवसे) जीने को (देहि) धारण करा-दे, प्रदान कर ॥३॥
भावार्थभाषाः - वायु के अन्दर जीवन देनेवाला बड़ा भारी कोष है, उस कोष का थोड़ा भी भाग ठीक से ढंग से अन्दर धारण किया जाय, तो स्वस्थ और दीर्घजीवन मिल सकता है ॥३॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

अमृत का निधि

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (वात) = वायो ! (ते गृहे) = तेरे घर में (यत्) = जो (अदः) = वह (अमृतस्य) = अमृत का (निधिः) = कोष (हितः) = रखा है, (ततः) = उसमें से (नः) = हमें भी (देहि) = कुछ दे जिससे (जीवसे) = हम उत्कृष्ट व दीर्घजीवन बिता पायें । [२] वायु में अमृत का कोष रखा है। शुद्ध वायु में भ्रमण व निवास से वह अमृत हमें भी प्राप्त होता है। इस प्रकार यह वायु हमारे दीर्घजीवन का कारण बनती है। वस्तुतः वायु ही आयु है। वायु के अभाव में तो गति का अभाव व मृत्यु ही है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- शुद्ध वायु का सेवन अमृत का पान है। वायु के महत्त्व को यह सूक्त अत्यन्त सुन्दरता से चित्रित कर रहा है। वायु सेवन से स्वस्थ शरीर, स्वस्थ हृदयवाला यह प्रभु का प्रिय बनता है, 'वत्स' होता है, निरन्तर उन्नति करता हुआ 'आग्नेय' [अग्नि पुत्र ] कहलाता है, आगे बढ़नेवाला । यह अग्नि ही उपासना करता हुआ कहता है कि-
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (वात) हे वायो ! (ते गृहे) तव ग्रहणे प्रतिष्ठाने “गृहा वै प्रतिष्ठा” [श० १।१।१९] (यत्-अदः-अमृतस्य निधिः-हितः) यदसौ ‘लिङ्गव्यत्ययः’ अमृतस्य-अमरणस्य जीवनस्य निधिर्निक्षेपः कोषो निहितोऽस्ति (ततः-नः-जीवसे देहि) तस्मादस्माकं जीवनाय देहीत्यर्थः ॥३॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - In your treasure home of immortal, inviolable energy, O breath of life energy, Vayu, there is immeasurable wealth hidden for us. Of that, from that, give us some, our share, so that we may live a full life of good health and joy.