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उ॒च्छ्वञ्च॑माना पृथि॒वी सु ति॑ष्ठतु स॒हस्रं॒ मित॒ उप॒ हि श्रय॑न्ताम् । ते गृ॒हासो॑ घृत॒श्चुतो॑ भवन्तु वि॒श्वाहा॑स्मै शर॒णाः स॒न्त्वत्र॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ucchvañcamānā pṛthivī su tiṣṭhatu sahasram mita upa hi śrayantām | te gṛhāso ghṛtaścuto bhavantu viśvāhāsmai śaraṇāḥ santv atra ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

उ॒त्ऽश्वञ्च॑माना । पृ॒थि॒वी । सु । ति॒ष्ठ॒तु॒ । स॒हस्र॑म् । मितः॑ । उप॑ । हि । श्रय॑न्ताम् । ते । गृ॒हासः॑ । घृ॒त॒ऽश्चुतः॑ । भ॒व॒न्तु॒ । वि॒श्वाहा॑ । अ॒स्मै॒ । श॒र॒णाः । स॒न्तु॒ । अत्र॑ ॥ १०.१८.१२

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:18» मन्त्र:12 | अष्टक:7» अध्याय:6» वर्ग:28» मन्त्र:2 | मण्डल:10» अनुवाक:2» मन्त्र:12


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (उच्छ्वञ्चमाना पृथिवी सुतिष्ठतु) जब पुलकितपृष्टा उफनी हुई-पोली सी बनी हुई पृथिवी तैयार हो जाती है तब (सहस्रं मितः-हि-उपश्रयन्ताम्) बहुसंख्या प्राप्त जीव उसके आश्रित रहते हैं (ते गृहासः-घृतश्चुतः-भवन्तु-अस्मै विश्वाहा-अत्र शरणाः सन्तु) जीवात्मा के लिए वे गर्भगृह रसपूर्ण और सर्वदा आश्रय देनेवाले होते हैं ॥१२॥
भावार्थभाषाः - जीवसृष्टि के लिए पृथिवी ऊपर पोली और मृदु कुछ काल तक बनी रहती है। पुनः उनमें असंख्य जीव आश्रित रहते हैं, अत एव आज तक भी स्व-स्वजातीय सङ्घ में रहने का स्वभाव प्रायः सभी जीवों में वर्तमान है। आत्मा के लिए गर्भगृह स्वाभाविक रस देते हुए शरणीय हैं ॥१२॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

घृत की धाराओं वाले घर

पदार्थान्वयभाषाः - [१] यह (उत् सु अञ्चमाना) = उत्साहयुक्त हुई हुई उत्तमता से गति करती हुई (पृथिवी) = सब प्रकार से शक्तियों का विस्तार करनेवाली माता (सुतिष्ठतु) = उत्तमता से स्थित हो । यह उदास होकर खाट पकड़कर न बैठ जाए। [२] इस घर में (सहस्त्रं मितः) = सहस्र संख्याक धन (हि) = निश्चय से (उपश्रयन्ताम्) = आश्रय करें। [२] (ते) = तेरे (गृहास:) = गृह (घृतश्श्रुतः) = घृत का क्षरण करनेवाले हों। इन घरों में घृत की धाराएँ बहें। किसी प्रकार से घृत की कमी न हो। (विश्वाहा) = सदा (अत्र) = इस घर में (अस्मै) = इस अकले रह गये जन के लिये (शरणा:) = रक्षण (सन्तु) = हों। अर्थात् बच्चों के पिता चले भी गये हैं, तो भी अन्य मामा, चाचा, दादा आदि लोग सहायक बने रहें । वे अपनी जिम्मेदारी को पहले से अधिक समझते हुए अपने कर्तव्य को उत्तमता से निभाये ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - माता के पुरुषार्थ से घर में धनों की कमी न हो, घर पूर्ववत् घृत हों, और अन्य बान्धवजन अपना सहारा दिये रखें।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (उच्छ्वञ्चमाना पृथिवी सुतिष्ठतु) यदा पुलकितपृष्ठा पृथिवी सम्यक् तिष्ठति तदा (सहस्रं मितः-हि उपश्रयन्ताम्) सहस्रं बहुसंख्यां प्राप्ताः ‘मितः-क्विपि ह्रस्वस्य पिति कृति तुकि प्रयोग औणादिकः’ “मिनोतिर्गतिकर्मा” [निघ०२।१४] जीवा उपतिष्ठन्ते (ते गृहासः-घृतश्चुतः-भवन्तु-अस्मै विश्वाहा-अत्र शरणाः सन्तु) जीवात्मने ते गृहासो गर्भकोशा घृतश्चुतः-रसपूर्णा भवन्तु-सन्तु, सर्वदाऽत्र शरणाः-शरण्याः सन्तु-सन्तीत्यर्थः ॥१२॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - May the earth stay abundant, generous and prosperous, giving life sustenance and shelter to uncountable souls which may live in here with peace and joy. O mother, may your homes be full of love and abound in food and delicacies, and may they always provide peace, pleasure and comfort for humanity.