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आ॒त्मा दे॒वानां॒ भुव॑नस्य॒ गर्भो॑ यथाव॒शं च॑रति दे॒व ए॒षः । घोषा॒ इद॑स्य शृण्विरे॒ न रू॒पं तस्मै॒ वाता॑य ह॒विषा॑ विधेम ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ātmā devānām bhuvanasya garbho yathāvaśaṁ carati deva eṣaḥ | ghoṣā id asya śṛṇvire na rūpaṁ tasmai vātāya haviṣā vidhema ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

आ॒त्मा । दे॒वाना॑म् । भुव॑नस्य । गर्भः॑ । य॒था॒ऽव॒शम् । च॒र॒ति॒ । दे॒वः । ए॒षः । घोषाः॑ । इत् । अ॒स्य॒ । शृ॒ण्वि॒रे॒ । न । रू॒पम् । तस्मै॑ । वाता॑य । ह॒विषा॑ । वि॒धे॒म॒ ॥ १०.१६८.४

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:168» मन्त्र:4 | अष्टक:8» अध्याय:8» वर्ग:26» मन्त्र:4 | मण्डल:10» अनुवाक:12» मन्त्र:4


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (देवानाम्-आत्मा) पृथिवी, जल, अग्नि, वायु का मिश्रण-स्वरूप (भुवनस्य गर्भः) जल का गर्भ जन्मदाता (एषः-देवः) यह वात देव (यथावशं चरति) आश्रय के अनुसार चलता है (अस्य घोषाः-इत्-शृण्विरे) इसके घोष नाद ही सुनाई पड़ते हैं (न रूपम्) रूप दिखलाई नहीं देता है (तस्मै वाताय) उस प्रचण्ड वायु के लिए (हविषा विधेम) होम से अनुकूल आचरण करें ॥४॥
भावार्थभाषाः - प्रचण्ड वात के अन्दर पृथिवी, जल, अग्नि, वायु के कण होते हैं, वह जलों का जन्म देनेवाला और आश्रय के अनुसार गति करनेवाला होता है, इस चलते हुए के शब्द सुनाई पड़ते हैं, रूप नहीं दिखाई देता है, इसे हवन के द्वारा अनुकूल बनाना चाहिये ॥४॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

आत्मा देवानाम्

पदार्थान्वयभाषाः - [१] यह प्राण (देवानां आत्मा) = सब इन्द्रियों का आत्मा है । सब इन्द्रियों में इस प्राण की ही शक्ति कार्य कर रही है (भुवनस्य गर्भ:) = प्राणिमात्र का यह गर्भ है, सब के अन्दर होनेवाला है। इसके बिना किसी प्राणी के जीवन का सम्भव नहीं । (एषः देवः) = यह प्रकाशमय प्राण (यथावशं चरति) = वश के अनुसार चलता है, जितना-जितना इसे काबू कर पाते हैं उतना उतना यह दीर्घकाल तक चलनेवाला होता है । [२] (अस्य) = इस प्राण के (घोषाः इत्) = शब्द ही (शृणिवरे) = सुनाई पड़ते हैं, रूपं न इस प्राण का रूप दिखाई नहीं पड़ता । (तस्मै वाताय) = इस प्राण के लिये हम (हविषा) = त्यागपूर्वक अदन से (विधेम) = पूजा करते हैं । प्राणसाधक के लिये मिताहार अत्यन्त आवश्यक है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सब इन्द्रियों को प्राण से ही शक्ति प्राप्त होती है। इस प्राणसाधना के लिये मिताहार आवश्यक है। सम्पूर्ण सूक्त प्राणसाधना के महत्त्व को सुव्यक्त कर रहा है। इस प्राणसाधक के लिये गो दुग्ध के महत्त्व को अगले सूक्त में कहते हैं । इन गौवों को खुली वायु में चरानेवाला वनविहारी 'शबर' अगले सूक्त का ऋषि है। यह प्रतिक्षण कमर कसे तैयार होने से 'काक्षीवत' है । इसकी प्रार्थना इस प्रकार है-
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (देवानाम्-आत्मा) पृथिवीजलाग्निवायूनां मिश्रणस्वरूपः (भुवनस्य गर्भः) जलस्य गर्भः-जन्मदाता “भुवनम्-उदकनाम” [निघ० १।१२] (एषः-देवः-यथावशं चरति) अयं देवो वातो यथाश्रयं चलति (अस्य घोषाः-इत्-शृण्विरे) अस्य नादाः खल्वेव श्रूयन्ते (न रूपम्) न रूपं दृश्यते (तस्मै वाताय हविषा विधेम) तस्मै वाताय होमेनाकूल्यमाचरेम ॥४॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Energy and identity of the divine forces of nature, sustainer of the universe, this divine wind roams around at will freely. We have heard the roar of it but we have not seen its form. To that divine Vayu, we offer homage and adoration with oblations of havi to develop energy.