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अ॒न्तरि॑क्षे प॒थिभि॒रीय॑मानो॒ न नि वि॑शते कत॒मच्च॒नाह॑: । अ॒पां सखा॑ प्रथम॒जा ऋ॒तावा॒ क्व॑ स्विज्जा॒तः कुत॒ आ ब॑भूव ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

antarikṣe pathibhir īyamāno na ni viśate katamac canāhaḥ | apāṁ sakhā prathamajā ṛtāvā kva svij jātaḥ kuta ā babhūva ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अ॒न्तरि॑क्षे । प॒थिऽभिः । ईय॑मानः । न । नि । वि॒श॒ते॒ । क॒त॒मत् । च॒न । अह॒रिति॑ । अ॒पाम् । सखा॑ । प्र॒थ॒म॒ऽजाः । ऋ॒तऽवा॑ । क्व॑ । स्वि॒त् । जा॒तः । कुतः॑ । आ । ब॒भू॒व॒ ॥ १०.१६८.३

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:168» मन्त्र:3 | अष्टक:8» अध्याय:8» वर्ग:26» मन्त्र:3 | मण्डल:10» अनुवाक:12» मन्त्र:3


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अन्तरिक्षे) आकाश में वर्त्तमान (पथिभिः) मार्गों से (ईयानः) गति करता हुआ (कतमत्-चनः-अहः) किसी दिन भी (न निविशते) नहीं ठहरता है (अपां सखा) आकाशीय सूक्ष्म जलों का साथी (प्रथमजाः) प्रथम प्रसिद्ध (ऋतावा) जलमय-जलगर्भित (क्व स्वित्-जातः) कहीं भी दूर स्थान में प्रसिद्ध हुआ (कुतः-आबभूव) किसी भी देश से फैला हुआ आता है ॥३॥
भावार्थभाषाः - वात-प्रचण्ड वायु या अन्धड़ आकाश में गतिमार्गों से गति करता हुआ कभी नहीं ठहरता है, चलता रहता है, उसके साथ जलवर्षा होती है, यह कहीं से उठता है और कहीं-कहीं होकर घूमता है, यह वर्षा के लिए हितकर है ॥३॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

रहस्यमय प्राण

पदार्थान्वयभाषाः - [१] द्युलोक शरीर में मस्तिष्क है, पृथिवी यह स्थूल शरीर है। इनके बीच में हृदयान्तरिक्ष है । इस (अन्तरिक्षे) = हृदयान्तरिक्ष में (पथिभिः) = विविध नाड़ी रूप मार्गों से (ईयमानः) - गति करता हुआ यह प्राण (कतमच्चन अहः) = किसी भी दिन (न निविशते) = गति से उपराम नहीं होता। यह सदा चलता ही है । अन्य इन्द्रियाँ श्रान्त हो जाती हैं, पर यह कभी श्रान्त नहीं होता। [२] (अपां सखा) = [आप: रेतो भूत्वा ] यह रेतः कणरूप जलों का मित्र है, रेतःकणों की ऊर्ध्वगति इस प्राण के ही कारण होती है । (प्रथमजाः) = यह सब से प्रथम उत्पन्न होता है, 'स प्राणमसृजत्' इन प्रश्नोपनिषद् के शब्दों में सब से प्रथम कला प्राण ही है। (ऋतावा) = यह ऋत का अवन [रक्षण] करनेवाला है, सब ठीक चीजें प्राण के ही कारण होती हैं । प्राणशक्ति की कमी शरीर में सब विकृतियों का कारण बनती है । [३] यह प्राण (क्वस्वित् जातः) = कहाँ प्रादुर्भूत हो गया व (कुतः आबभूव) = कहाँ से प्रकट हो गया ? इसे सामान्यतः कोई जानता नहीं। 'यह शरीर में है' बस इतना ही स्पष्ट है । इस प्राण की महिमा दुर्ज्ञेय ही है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्राण सतत गतिवाला है। रेतःकणों की ऊर्ध्वगति का साधक है शरीर में सब व्यवस्थाओं को ठीक रखता है । है रहस्यमय ।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अन्तरिक्षे) आकाशे वर्तमानः (पथिभिः) मार्गैः (ईयानः) गच्छन् (कतमत्-चन-अहः) कतमद्दिनमपि (न निविशते) न तिष्ठति (अपां सखा आकाशीयसूक्ष्मजलानां सखा (प्रथमजाः-ऋतावा) प्रथमः प्रसिद्धो जलमयो जलगर्भितः “ऋतमुदकनाम” [निघ० १।१२] (क्व स्वित्-जातः) कुत्रापि दूरस्थाने प्रसिद्धो भवसि (कुतः-आबभूव) कुतोऽपि प्रसृतो भवति ॥३॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Ever on the move by its own paths in the sky, the wind energy does not relent even for an instant. Friend and comrade of the waters, first born of nature after space, observing the divine laws of existence, where was it born? Where and whence emerged?