पदार्थान्वयभाषाः - [१] द्युलोक शरीर में मस्तिष्क है, पृथिवी यह स्थूल शरीर है। इनके बीच में हृदयान्तरिक्ष है । इस (अन्तरिक्षे) = हृदयान्तरिक्ष में (पथिभिः) = विविध नाड़ी रूप मार्गों से (ईयमानः) - गति करता हुआ यह प्राण (कतमच्चन अहः) = किसी भी दिन (न निविशते) = गति से उपराम नहीं होता। यह सदा चलता ही है । अन्य इन्द्रियाँ श्रान्त हो जाती हैं, पर यह कभी श्रान्त नहीं होता। [२] (अपां सखा) = [आप: रेतो भूत्वा ] यह रेतः कणरूप जलों का मित्र है, रेतःकणों की ऊर्ध्वगति इस प्राण के ही कारण होती है । (प्रथमजाः) = यह सब से प्रथम उत्पन्न होता है, 'स प्राणमसृजत्' इन प्रश्नोपनिषद् के शब्दों में सब से प्रथम कला प्राण ही है। (ऋतावा) = यह ऋत का अवन [रक्षण] करनेवाला है, सब ठीक चीजें प्राण के ही कारण होती हैं । प्राणशक्ति की कमी शरीर में सब विकृतियों का कारण बनती है । [३] यह प्राण (क्वस्वित् जातः) = कहाँ प्रादुर्भूत हो गया व (कुतः आबभूव) = कहाँ से प्रकट हो गया ? इसे सामान्यतः कोई जानता नहीं। 'यह शरीर में है' बस इतना ही स्पष्ट है । इस प्राण की महिमा दुर्ज्ञेय ही है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्राण सतत गतिवाला है। रेतःकणों की ऊर्ध्वगति का साधक है शरीर में सब व्यवस्थाओं को ठीक रखता है । है रहस्यमय ।