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सं प्रेर॑ते॒ अनु॒ वात॑स्य वि॒ष्ठा ऐनं॑ गच्छन्ति॒ सम॑नं॒ न योषा॑: । ताभि॑: स॒युक्स॒रथं॑ दे॒व ई॑यते॒ऽस्य विश्व॑स्य॒ भुव॑नस्य॒ राजा॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

sam prerate anu vātasya viṣṭhā ainaṁ gacchanti samanaṁ na yoṣāḥ | tābhiḥ sayuk sarathaṁ deva īyate sya viśvasya bhuvanasya rājā ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

सम् । प्र । ई॒र॒ते॒ । अनु॑ । वात॑स्य । वि॒ऽस्थाः । आ । ए॒न॒म् । ग॒च्छ॒न्ति॒ । सम॑नम् । न । योषाः॑ । ताभिः॑ । स॒ऽयुक् । स॒ऽरथ॑म् । दे॒वः । ई॒य॒ते॒ । अ॒स्य । विश्व॑स्य । भुव॑नस्य । राजा॑ ॥ १०.१६८.२

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:168» मन्त्र:2 | अष्टक:8» अध्याय:8» वर्ग:26» मन्त्र:2 | मण्डल:10» अनुवाक:12» मन्त्र:2


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (विष्ठाः) पृथिवी में प्रविष्ट होकर स्थित ओषधि-वनस्पतियाँ (वातस्य-अनु) प्रचण्ड वायु के पीछे-साथ (संप्रेरते) काँपती हैं-झूलती हैं (एनं योषाः-न) इस प्रचण्ड वायु को स्त्रियों की भाँति-स्त्रियों जैसे (समनम्-आ गच्छन्ति) समान मनोभावन स्थान को प्राप्त होती हैं, उसी भाँति वात के पीछे ओषधियाँ गति करती हैं (अस्य विश्वस्य भुवनस्य) इस सारे पृथिवीलोक का (देवः) वातदेव राजा होकर (ताभिः सयुक्) उन प्रजासदृश ओषधियों के साथ समान घोड़ेवाला (सरथम्-ईयते) समानरथ के प्रति गति करता है ॥२॥
भावार्थभाषाः - पृथिवी में स्थित होकर पृथिवी पर पुष्ट होकर ओषधि-वनस्पतियाँ वायु के साथ गति करती हैं, काँपती हैं, जैसे स्त्रियाँ एक मन होकर किसी आश्रयस्थान को प्राप्त-होती हैं, पृथिवीलोक की सारी वस्तुएँ इसका अनुगमन करती हैं ॥२॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

अन्य प्राणों के साथ 'मुख्य प्राण'

पदार्थान्वयभाषाः - [१] यह प्राण शरीर में ४९ भागों में विभक्त होकर स्थित होता है। ये ४९ प्रकार के (मरुत्) = प्राण (विष्ठा:) = विविध स्थानों में स्थित हैं। ये सब वातस्य अनु संप्रेरते उस मुख्य प्राण के अनुसार गतिवाले होते हैं। मुख्य प्राण की गति ही इन सब की गतियों को नियमित करती है । (एनम्) = इस प्राण को ही ये सब अन्य (मरुत् आगच्छन्ति) = इस प्रकार सब ओर से प्राप्त होते हैं, (न) = जैसे कि (योषाः) = स्त्रियें (समनम्) = [सं अन] उत्तम प्राणशक्तिवाले पुरुष को प्राप्त होती हैं । [२] यह (देवः) = सब रोगों को जीतने की कामनावाला प्राण (ताभिः) = उन योषा तुल्य अन्य मरुतों के (सयुक्) = साथ मिला हुआ (सरथम्) = इस समान ही शरीररूप रथ पर (ईयते) = गति करता है । वस्तुत: यह प्राण ही (अस्य) = इस (विश्वस्य) = सब (भुवनस्य) = प्राणियों का (राजा) = दीपन करनेवाला है । प्राणसाधना से शरीर की सब शक्तियाँ चमक उठती हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- शरीर में प्राण भिन्न-भिन्न रूपों में विविध स्थानों में स्थित होकर कार्य कर रहा है । वे सब प्राण इस मुख्य प्राण के साथ कार्य करते हुए शरीर की शक्तियों को दीप्त करते हैं ।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (विष्ठाः-वातस्य-अनुसम्प्रेरते)  पृथिव्यां प्रविश्य स्थिताः-ओषधि-वनस्पतयो वातस्यानुकूलं कम्पन्ते (एनं योषाः-न समनम्-आगच्छन्ति) एतं स्त्रियः इव समानमनोभावस्थानं प्राप्नुवन्ति तद्वत् (अस्य-विश्वस्य भुवनस्य देवः-राजा) अस्य सर्वस्य पृथिवीलोकस्य राजा भूत्वा (ताभिः सयुक् सरथम्-ईयते) ताभिः प्रजाभिः सह समानाश्वः समानरथो गच्छति ॥२॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Plants, creepers and solid structures on earth, like trees, wave and shake in deference to Vayu, wind energy, just as youthful maidens go to their love and flashes of lighting go with the sky. And one with all these, goes the ruling energy of this whole universe, divine wind on the chariot of its currents.