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यस्ते॒ हन्ति॑ प॒तय॑न्तं निष॒त्स्नुं यः स॑रीसृ॒पम् । जा॒तं यस्ते॒ जिघां॑सति॒ तमि॒तो ना॑शयामसि ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yas te hanti patayantaṁ niṣatsnuṁ yaḥ sarīsṛpam | jātaṁ yas te jighāṁsati tam ito nāśayāmasi ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यः । ते॒ । हन्ति॑ । प॒तय॑न्तम् । नि॒ऽस॒त्स्नुम् । यः । स॒री॒सृ॒पम् । जा॒तम् । यः । ते॒ । जिघां॑सति । तम् । इ॒तः । ना॒श॒या॒म॒सि॒ ॥ १०.१६२.३

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:162» मन्त्र:3 | अष्टक:8» अध्याय:8» वर्ग:20» मन्त्र:3 | मण्डल:10» अनुवाक:12» मन्त्र:3


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (यः) जो (ते) तेरे (पतयन्तम्) गर्भाशय में वीर्यरूप में प्रविष्ट हुए (निषत्स्नुम्) स्थितिशील गर्भ को (हन्ति) नष्ट करता है (यः) जो (सरीसृपम्) गर्भाशय में गति करते हुए गर्भ को (यः) जो (जातम्) उत्पन्न बालक को (जिघांसति) मारना चाहता है, (तम्) उस कृमि को (इतः-नाशयामसि) इससे नष्ट करते हैं ॥३॥
भावार्थभाषाः - स्त्री के अन्दर गर्भ के अन्दर प्राप्त वीर्य को या उससे बने गर्भ को या फिर उत्पन्न हुए बालक को जो नष्ट करता है, उस रोगरूप कृमि को पूर्वोक्त प्रकार से नष्ट करना चाहिए ॥३॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

गर्भाधान से जातकर्म तक

पदार्थान्वयभाषाः - [१] गर्भाधान काल में (पतयन्तम्) = गर्भ में जाते हुए (ते) = तेरे वीर्यांश को (यः) = जो (हन्ति) = नष्ट करता है। अब (निषत्स्नुम्) = गर्भ में निषण्ण होते हुए जीव को जो नष्ट करता है । (यः) = जो तीन मास के बाद (सरीसृपम्) = सर्पणशील उस गर्भस्थ बालक को नष्ट करता है, (तम्) = उस रोगकृमि को (इतः) = यहाँ से (नाशयामसि) = हम नष्ट करते हैं । [२] (यः) = जो रोग (ते) = तेरे (जातम्) = उत्पन्न हुए हुए बालक को (जिघांसति) = नष्ट करना चाहता है, उस रोग को भी हम नष्ट करते हैं । प्रथम व द्वितीय मन्त्र के अनुसार गर्भ व योनिगत दोषों को दूर करने के बाद गर्भाधानकालीन दोषों को भी दूर करते हैं और फिर गर्भावस्था में समय-समय पर आ जानेवाले रोगों से बचाते हैं । अन्ततः उत्पन्न हुए हुए बालक का भी रोगों से रक्षण करते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- गर्भस्थ बालक के जीवन को प्रारम्भ से अन्त तक रोगों से बचाने का प्रयत्न करते हैं।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (यः) यः खलु (ते) तव (पतयन्तम्) गर्भाशये वीर्यरूपे प्रविष्टम् (निषत्स्नुम्) स्थितिशीलवन्तम् (हन्ति) नाशयति (यः) यश्च (सरीसृपम्) गर्भाशये गतिं कुर्वन्तम् (यः) यश्च (जातम्) उत्पन्नं बालकं (जिघांसति) हन्तुमिच्छति (तम्) तं कृमिम् (इतः-नाशयामसि) अस्मान्नाशयामः ॥३॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Whatever afflicts the insemination and fertilisation process or the moving foetus or whatever hurts and damages your new born baby, we destroy from here.