पदार्थान्वयभाषाः - [१] प्रगतिशील जीव को 'अग्नि' कहते हैं। यह अग्नि अपने इस शरीर को चमस = सोमपात्र बनाता है। इस शरीररूप चमस में वह सोम-वीर्य को सुरक्षित रखता है। जैसे घृत पूर्ण चम्मच कुछ टेढ़ा हो जाए तो घृत के गिरने की आशंका हो जाती है, उसी प्रकार इस शरीररूप चमस के भी टेढ़े होने से, इसमें कुटिलता के आने से सोम का नाश हो जाता है। इसलिए मन्त्र में कहते हैं किं (अग्ने) = हे प्रगतिशील जीव ! (इमं चमसम्) = इस सोमपात्रभूत शरीर चमस को (मा विजिह्वर:) = तू कुटिल मत होने दे। यदि यहाँ कुटिल वृत्तियाँ पनप उठी तो सोम के रक्षण का सम्भव न रहेगा। [२] सोम के रक्षण से ही तो यह शरीर (देवानाम्) = देवताओं का बनता है (उत) = और यह शरीर (सोम्यानाम्) = सोम्य - शान्त-पुरुषों का होता है। अर्थात् सोम के सुरक्षित होने पर हम देववृत्ति वाले व सोम स्वभाव के होते हैं । दिव्यगुणों को विकसित करने का तथा सोम्यता के सम्पादन का उपाय यही है कि हम इस शरीर को चमस सोमपात्र बनाएँ। यह देवों व सोम्यों का चमस (प्रियः) = अत्यन्त प्रिय होता है, बड़ा प्यारा लगता है, कान्ति सम्पन्न होता है । [३] (एषः) = यह (यः) = जो (चमस:) = सोमपात्र बना हुआ शरीर है, जो कि (देवपान:) = देवों के सोमपान का स्थान बनता है [पिबन्ति अस्मिन् इति पान: ] (तस्मिन्) = उस शरीर में (देवाः) = देव लोग (अमृताः) = रोगरूप मृत्युओं से आक्रान्त न होते हुए तथा विषय-वासनाओं के पीछे न मरते हुए (मादयन्ते) = हर्षित होते हैं। इस शरीर में देव नीरोगता व निर्मलता के आनन्द का अनुभव करते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - कुटिल वृत्तियों से ऊपर उठकर हम शरीर में सोमरक्षण के द्वारा इस शरीर को देवों व सोम्य पुरुषों का प्रिय शरीर बनायें। हम नीरोग व निर्मल वृत्ति के बनकर आनन्द का अनुभव करें।